September 27, 2020

एक गांव के अधिकतर घरों में नाच रही है मौत! दर्द से तड़प रहे हैं लोग

पाली जिले के कागड़दा

सांध्य ज्योति संवाददाता
जयपुर, 11 सितम्बर। पाली जिले के बाली उपखंड के कागड़दा गांव के हर घर में दर्द है। इस गांव के हर घर में कोई न कोई जीवन की अंतिम सांसें गिन रहा है। किसी के घर में बूढ़ी मां अपने 3 जवान बेटों को पल-पल तड़पता देख रही है तो कहीं मासूम बच्चे रोटी के लिए किसी के रहमों करम की उम्मीद लगाए बैठे हैं। इस गांव में कई महिलायें ऐसी भी हैं जो 20 साल की उम्र भी पार नहीं कर पाई है और विधवा हो गई। गांव में 100 से ज्यादा ऐसे युवक हैं जो हर पल अपनी अपनी मौत का इंतजार कर रहे हैं। इसकी वजह है सिलकोसिस की बीमारी। इस बीमारी ने कागड़दा गांव को पूरी तरह से जकड़ लिया है। बीमारी से गांव में अब करीब 70 से 80 लोगों की मौत हो चुकी है।

गांव बीमारी से उबर नहीं पा रहा
गांव के युवाओं ने अपना पेट पालने के लिए पत्थर कटाई का काम पकड़ा था। इस काम से उनके घर में पैसा भी आने लगा और चूल्हा भी जलने लगा लेकिन इसके साथ ही उनके घरों में सिलकोसिस बीमारी ने भी डेरा डाल दिया। गांव के युवाओं द्वारा बच्चों का पेट भरने के लिये अपनाया गया यह रास्ता उन्हें मौत के रास्ते की ओर ले गया। सिलिकोसिस बीमारी ने इन युवाओं को ऐसा डसा है कि गांव में वीरानी छा गई है। यह गांव इस बीमारी से उबर नहीं पा रहा है।

जांच से घबराने लग गए
गांव के लोगों में इस बीमारी का खौफ इतना हो गया है कि ये अस्पताल जाकर अपनी जांच तक नहीं करवा रहे हैं। इन सब के बीच सबसे बड़ी बात यह है कि इस गांव में अब आगे की पीढ़ी चलने के लिए भी कोई रास्ता नहीं बचा है। यहां कई युवक हैं जो शादी की उम्र पार कर चुके हैं। लेकिन कोई भी उन्हें अपनी बेटी देने को तैयार नहीं है। यहां रिश्ता करने वालों के मन में पहले ही यह सवाल आ जाता है कि पता नहीं कब उसकी बेटी का सुहाग उजड़ जाए। कागड़दा के लोग खुद डर के साए में जी रहे हैं।

पिछले 5 बरसों से शुरू हुआ है यह सिलसिला
पाली के बाली और रायपुर उपखंड के कई गांव हैं जहां कच्चे पत्थर के खदान में पत्थर घिसाई एवं कटाई का काम करने के लिए लोग मजदूरी करते हैं। सुरक्षा उपकरणों के अभाव में पत्थरों से उडऩे वाली डस्ट से ये लोग धीरे धीरे सिलिकोसिस बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं। उन्हें खुद भी इस बीमारी का पता नहीं चलता। धीरे-धीरे उनके शरीर में जब सिलिकोसिस के लक्षण नजर आने लगते हैं तब तक हालात बेकाबू हो जाते हैं और वे मौत के मुहाने पर आ जाते हैं। पिछले 5 बरसों से यह सिलसिला शुरू हुआ है। हालांकि हाल ही में राज्य सरकार की ओर से सिलकोसिस नीति लाई गई है। सिलिकोसिस के मरीजों के लिए आर्थिक सहायता के कई रास्ते खोले गए हैं। इनके लिए पेंशन की व्यवस्था भी की गई है लेकिन बीमारी का खौफ गांव वालों को जीने नहीं दे रहा है।