September 24, 2020

कविता: पिता

आओ साथियों आपको उस शख्श से मिलवाए।
त्याग, तप व बलिदान की एक लघु गाथा बतलाए।।
बाबूजी से पिताजी, पिताजी से पापा कहलाए,
नवपीढ़ी नवांकुरों के लिए जो डैडी भी बन जाए।।
पीढिय़ां बदली पर उनके भाव बदल न पाए,
बच्चों की खातिर जो हसंते हर कष्ट को सह जाए।।
विधाता की मूर्ती है वो, इसमें नहीं कोई दोराय।
आओ साथियों आपको उस शख्स से मिलवाए।।

माँ की मांग का सिंदूर जिसकी उम्र बढ़ाता जाए।
बच्चों की पॉकेटमनी के लिए जो मिनीबैंक बन जाए
बेटे के वो दोस्त, बेटी के लिए बॉडीगार्ड बन जाए।
चिंता अपने मन की जो, स्पष्ट बता न पाए।।
उनसे ही तो खुशिया घर की, हर समस्या का है उपाय।
आओ साथियों आपको उस शख्स से मिलवाए।।

घर के रक्षक बनकर आप महावीर कहलाए।
आपके त्याग की बराबरी जग में कोई कर न पाए।।
आप कष्ट सहकर बच्चों के आंच न आने पाए।
आप बिना जग सुना, आपके आने से मन हर्षाये।।
आओ साथियों आपको उस शख्स से मिलवाए।
त्याग, तप, बलिदान की एक लघुगाथा बतलाये।।

-गौरव सिंह घाणेराव
सुमेरपुर (पाली)