September 22, 2020

कविता: समय आ गया है…

हे ईश्वर! यह कैसा हाहाकार,
कोरोना ने किया अनर्थ अपार।
सूनी हुई शहरों की सारी गलियां ऐसे,
डर से सहम गई फूलों की कलियां जैसे।
कोविड-19 का कहर है ऐसा बरसा,
लड़ा जो इससे योद्धा मिलने परिवार को वो तरसा।
होकर मजबूर इंसानों का टोला, मीलों पैदल चल रहा,
अपने पांव के छालों से, सपनों को अपने मसल रहा।
चरमराकर तैयार हुई ढहने को अर्थव्यवस्था
कोरोना के बाद से हुई तहस-नहस सब व्यवस्था
चंगुल में इसके फंस कर समय बहुत गुजार लिया
घरों में होकर लॉकडाउन हिम्मत का मन मार लिया।
परंतु अब समय आ गया है!
तजकर बैसाखी डर की
खड़े होना है पैरों पर,
आस छोड़ राहत पैकेज की,
बनो अब आत्मनिर्भर।
अपनाकर स्वदेशी विदेशी को देंगे पछाड़
नहीं ले जाने देंगे भारत की जड़े उखाड़।
सोशल डिस्टेंसिंग का करके पालन
दिनचर्या का करेंगे सामान्य परिचालन।
आगे बढऩा होगा, हमें अब लडऩा होगा
जिसने धकेला गर्त में उस महामारी को खदेङऩा होगा।
नया विचार, बेहतर आधार अपनाना होगा
चमत्कार के इंतजार में ना समय गंवाना होगा।
जो जा पहुंचे हैं गांवों में वह लहलहाएं फसलें
सिर उठाकर जी सके, जिससे हमारी नस्ले।
लघु व गृह उद्योगों से रोजगार बढ़ाएंगे
हम हैं भारत के युवा मुश्किल से ना घबराएंगे।
समय आ गया है दूरी रखकर भी मिलजुल कर रहने का
कोरोना वायरस को हराकर शुद्ध हवा में जीने का।
सभी सावधानी रखेंगे, जीवन का पुनर्निर्माण करेंगे
इस महामारी के अंधेरे से लड़ कर, नई उम्मीद का सवेरा देखेंगे।
अब वाकई समय आ गया है!

-डॉ. दीपिका शर्मा, जयपुर