September 25, 2020

काव्य सुधा: बचपन का गांव…

वीरान पड़े उस सूने मकान के,
दर-ओ-दीवार से लटक आए हैं,
मायूसी के जाले

चाय की शोखियां जहां पर,
इतरा कर महकती थी,
सूखे पड़े हैं वह प्याले

अंजुमन की दहलीज पर,
जहां बचपन हुआ था जवान,
रह गए बस सिसकते ताले

जिस सकाफत की चादर को,
ओढ़ कर सोता था बचपन,
यादों की संदूक में सिमट गए दुशाले

जिन दरख्तों के पत्तों से झांकती थी,
आफताब की छोटी-छोटी बूंदें,
सूख गई है उस पेड़ की डालें

झुर्रियों भरी जिस तबस्सुम से,
निकलती थी बस दुआ,
खो गए वह रखवाले

जिन झारोखों से आती थी,
रंग बिरंगी हवा की महक,
वह भी पड़ गए काले

अश्कों से भर आई आंखें,
याद कर के बचपन का गांव,
कोई तो मुझे संभाले