October 27, 2020

किडनी है शरीर की फिल्टर मशीन

किडनी रोग से पीडि़त होने के बाद मरीज की जिंदगी बचाना मुश्किल हो रहा है। देश में किडनी रोग से पीडि़त केवल दस फीसदी महिलाओं को ही घर के किसी सदस्य द्वारा किडनी दान में मिलती है। जबकि किडनी फेल होने के बाद सिर्फ 5-8 फीसदी मरीज ही डायलिसिस करा पाते हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार किडनी रोग की चपेट में आने के बाद 50 फीसदी महिलाओं को ही रोग का समय पर पता चल पाता है। गर्भवती मरीज है तो उसके गर्भस्थ शिशु को भी खतरा हो सकता है।

इसलिए जरूरी है स्वस्थ किडनी
किडनी शरीर का अहम अंग है जिसे फंक्शनल यूनिट भी कहते हैं। एक किडनी में करीब दस लाख नेफ्रॉन्स होते हैं। ये शरीर में मौजूद विषैले पदार्र्थों को यूरिन के जरिए बाहर निकालती है। यह शरीर में तरल का स्तर संतुलित रखती है ताकि पूरे शरीर में पानी की जरूरी मात्रा पहुंच सके। किडनी खून बनाने और इसे फिल्टर करने का भी काम करती है। इसमें विशेष तरह का हार्मोन एरीथ्रोपोएटिन होता है जो खून बनाने की प्रक्रिया को बढ़ाता है। एक स्वस्थ व्यक्ति की किडनी का वजन करीब 150 ग्राम जबकि लंबाई 10 सेंटीमीटर होती है।

लक्षणों की देरी से पहचान
क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) की चपेट में आने के बाद लक्षण अक्सर देर से ही सामने आते हैं। इसमें सबसे पहले रोगी के चेहरे और पैरों पर सूजन, खून की कमी, भूख न लगना, पेशाब की मात्रा में कमी, शरीर में खुजली होना, शरीर का रंग काला पडऩा आदि लक्षण सामने आते हैं। सीकेडी के रोगी में कार्डियोवैस्कुलर डिजीज की समस्या भी होती है। वहीं महिलाओं को माहवारी के दौरान काफी दर्द और यौन संबंध बनाने में तकलीफ होती है। सीकेडी में किडनी पहले फूलती है फिर सिकुड़ कर धीरे-धीरे बेहद छोटे आकार की हो जाती है।

  • 7,35,000 रोगी देशभर में क्रॉनिक किडनी डिजीज की चपेट में आकर अपनी जान गंवा देते हैं।
  • 2,20,000 लोगों को किडनी प्रत्यारोपण की जरूरत है, 15 हजार किडनी ट्रांसप्लांट ही हो पाते हैं।
  • 90 प्रतिशत किडनी ट्रांसप्लांट मामलों में किसी करीबी डोनर (ब्लड रिलेशन ) से किडनी ली जाती है।
  • 1971 से 2015 तक देश में 21,395 किडनी ट्रांसप्लांट किए गए, इनमें 783 कैडेवर डोनर से मिले।
  • 3 में से एक महिला यूटीआई (यूरिन संक्रमण) से ग्रस्त है दुनियाभर में
  • पुरुषों की तुलना में महिलाओं में सीकेडी के मामले ज्यादा होते हैं।
  • तकरीबन 27 करोड़ महिलाएं सीकेडी से ग्रस्त हैं।

इलाज की राह हो गई आसान
आमतौर पर किडनी संबंधी रोगों के इलाज की शुरुआत में दवाओं व डायलिसिस की मदद लेते हैं। लेकिन इनसे राहत न मिलने पर इलाज के कई अन्य तरीके भी अपनाए जाते हैं।

किडनी ट्रांसप्लांट: किडनी फेल होने के बाद गुर्दा प्रत्यारोपण ही आखिरी इलाज है। रोगी का परिजन (ब्लड रिलेशन) अपनी किडनी दान कर उसकी जान बचा सकता है। सीकेडी रोग के सभी रोगियों का समय रहते ही ट्रांसप्लांट होना जरूरी है। वर्ना कुछ समय बाद रोगी की जान बचा पाना मुश्किल होता है। आजकल ओपन, लेप्रोस्कोपिक और रोबोटिक किडनी ट्रांसप्लांट की सुविधा है।

दवाओं-डायलिसिस की मदद
किडनी संबंधी किसी भी प्रकार के रोग के लिए आमतौर पर शुरुआती स्टेज में दवाओं के अलावा रोगी को खानपान में सुधार की सलाह देते हैं। इसके बावजूद यदि किडनी अपना काम पूर्ण रूप से नहीं कर पाती तो डायलिसिस करना पड़ता है। अन्य ब्लड गु्रप की किडनी से मान ब्लड गु्रप के डोनर के अभाव में एबीओ इंकॉम्पेटिबल किडनी ट्रांसप्लांट प्रक्रिया अपनाते हैं। इसके तहत प्लाज्मा में से रक्त के भीतर की एंटीबॉडीज को हटाते हैं ताकि उसका रक्त दूसरे ब्लड ग्रुप की किडनी को प्रत्यारोपण के बाद स्वीकार कर ले।

क्रॉस ट्रांसप्लांट रोगी: डोनर का ब्लड ग्रुप जब मैच नहीं करता है तो एक कानूनी प्रक्रिया को पूरा करने के बाद रोगी की जान बचाने के लिए क्रॉस ट्रांसप्लांट किया जाता है।

कैडेवर ट्रांसप्लांट
इसमें ब्रेन डेड मरीज की दोनों किडनियों को दो मरीजों को लगाकर उन्हें नया जीवन देने का काम हो रहा है। इसे लेकर देशभर में जागरुकता की जरूरत है। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दाता के अभाव में लंबे से किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे मरीजों के लिए उम्मीद की किरण जगाई है। उन्होंने हेपेटाइटिस-सी से संक्रमित किडनी रोगी के इलाज का तरीका निकाला व उनकी किडनी को प्रत्यारोपण के जरूरतमंद मरीजों के लिए उपयोगी बनाने का प्रयास किया। हेपेटाइटिस-सी से संक्रमित किडनी रोगी को शोध के दौरान एंटीवायरल दवा दी गई ताकि संक्रमण शरीर में न फैले। ये दवाएं ट्रांसप्लांट के बाद भी 12 हफ्तों तक जारी रहीं। कुछ समय बाद संक्रमण का असर कम पाया गया।