September 21, 2020

खेती में नवाचार से देश में बढ़ा कई गुना उत्पादन

हमारे देश में कृषि वह प्रक्रिया है जो कुछ पौधों की खेती तथा पालतू पशुओं के पालन द्वारा भोजन, चारा, रेशे तथा अन्य मनचाहे पदार्थों को उत्पन्न करती है। दूसरे विश्व युद्ध के उपरांत कृषि का स्वरूप ही बदल गया है। नई तकनीकों के प्रयोगों में मशीनों के प्रयोग द्वारा, उर्वरकों एवं कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग और सिंचाई की प्रणालियों के विस्तार इत्यादि के अधिक प्रयोग के माध्यम से खाद्यान्न व रेशों का उत्पाद कई गुना बढ़ गया है। इन परिवर्तनों के कारण किसान अब कम मेहनत के बावजूद अधिकांश खाद्यान्न व रेशे की मांग को पूरा करने लगे। यद्यपि इन नई तकनीकों का बहुत लाभ हुआ है, परन्तु इन्हीं के कुछ हानिकारक परिणाम भी हुए हैं- भूमि की ऊपरी परत के स्तर में गिरावट व भूमिगत जल के प्रदूषण के कारण कुछ गंभीर सामाजिक व पर्यावरण-संबंधी समस्याएं पैदा हो गई हैं। इसके अतिरिक्त नई मशीनों व उपकरणों के प्रयोग से खेतों पर काम करने वाले मजदूरों में बेरोजगारी की समस्या बढ़ी है।
पिछले दो दशकों में कृषि विशेषज्ञों की भूमिका की आलोचना हुई है, जिनके द्वारा ये सामाजिक समस्याएं बढ़ी हैं। आधुनिक कृषि की विधियों का नकारात्मक परिणाम देखकर, अब ‘दीर्घोपयोगी कृषि’ की मांग उठ रही है। दीर्घोपयोगी कृषि-प्रणाली पर्यावरण को संरक्षित करने की प्रणालियों के साथ-साथ कृषकों, मजदूरों, उपभोक्ताओं आदि, नीति निर्णायकों व अन्य लोगों के लिए सम्पूर्ण खाद्य तंत्र के लिए नवीनीकृत व आर्थिक रूप से अच्छे स्तर के सुअवसरों को प्रदान करने का प्रयास कर रही है।