September 21, 2020

गुप्त महापर्व ‘सुरैया’ राधाष्टमी

ये पर्व आमजन में प्रचलित न होकर सिद्धों और साधकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधाअष्टमी कहते हैं।
भारत वर्ष में त्योहारों और पर्वों की समृद्ध शृंखला है। दिवाली, होली, गणेशोत्सव जैसे कई ऐसे त्योहार हैं, जो बहुत प्रसिद्ध हैं, जिन्हें लोग उत्सव की तरह मनाते हैं और महानिशा, नवरात्रि और शिवरात्रि के मानिंद कई पर्व हैं, जो उपासना के लिए, स्वयं की ऊर्जा से मुखातिब होने के लिए बहुत कारगर माने जाते हैं। पर कुछ ऐसे महापर्व भी हैं, जो हैं तो बेहद प्रभावी और कभी बड़े प्रचलित भी थे, पर कालांतर में वे गुप्त और लुप्तप्राय हो गए। उत्तर और पूर्व भारत का एक गुप्त महापर्व ‘सुरैया’। ये पर्व आमजन में प्रचलित न होकर सिद्धों और साधकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधाअष्टमी कहते हैं। राधाअष्टमी स्वयं में एक महापर्व है। शास्त्रों में इस तिथि को श्री राधाजी के प्राकट्य दिवस के रूप में मान्यता प्राप्त है। कहते हैं कि इसी दिन राधा वृषभानु की यज्ञ भूमि से प्रकट हुई थीं। इस अष्टमी से कृष्ण पक्ष की अष्टमी का काल सुरैया कहलाता है। सुरैया, यानी वह काल जो जीवन को सुर में ढाल दे। हम आपको बता रहे हैं राधाजी के जीवन से जुड़े ऐसे रहस्य जो पहले नहीं सुने होंगे आपने।

देवी राधा ने किया शरीर का त्याग
राधा-कृष्ण के प्रेम की मिसाल यूं ही पूरी दुनिया में नहीं दी जाती। बिना विवाह किए ही राधाजी कृष्ण को अपना स्वामी मानने लगी थीं तो वहीं कृष्णजी भी राधारानी दिल से स्वीकार कर चुके थे। पुराणों में भगवान श्रीकृष्ण को विष्णुजी का अवतार बताया है कि तो राधिका को लक्ष्मी स्वरूपा माना है। कृष्ण के बिना राधा अधूरी हैं तो राधा के बिना कृष्ण। कहते है राधाजी के पृथ्वी लोक छोडऩे से पहले श्रीकृष्ण उनसे मिलने आए हुए थे। राधारानी ने कान्हा से कहा कि वह उनकी मुरली की धुन सुनते हुए धरती से विदा होना चाहती हैं। तब कान्हा ने मुरली बजाई और राधा वापस चली गईं। कहते हैं कि श्रीकृष्ण अपनी प्रेमिका की मृत्यु बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने बांसुरी तोड़कर झाड़ी में फेंक दी। उसके बाद से श्रीकृष्ण ने जीवन में कभी बांसुरी नहीं बजाई।