September 25, 2020

घर में भी आराम से कर सकते हैं मशरुम की खेती

मशरूम की खेती भारत में बहुत ही तेजी के साथ लोकप्रिय होती जा रही हैं क्योंकि यह न केवल हमारे आहार आवश्यकताओं को पूरा करती हैं बल्कि यह हमारे लिए कमाई का जरिया भी है, जिन लोगों के पास ज्यादा जमीन नहीं हैं खेती करने के लिए वो अपने घर में भी आराम से मशरूम की खेती कर सकते हैं। आज कल मशरूम की खेती करना लोगों का एक शौक होता जा रहा है। घर की महिलाएं अपने घर के काम के साथ मशरूम की खेती आराम से कर सकती हैं मशरूम की खेती करना कोई मुश्किल काम नहीं हैं अगर आप उत्पादक बढ़ाने के लिए कुछ सरल नियमों का पालन करें। आप अपने घर पर ही कोई कंटेनर यह बॉक्स में मशरूम ऊगा सकते हैं और यह लगभग छह सप्ताह के भीतर, एक कमरे के अंदर एक अत्यधिक लाभदायक फसल के रूप में तैयार हो जाता हैं मशरूम की खेती आप किसी भी कमरे, शेड, बेसमैंट, गेराज इत्यादि में कर सकते हैं जो अच्छी तरह से हवादार होना चाहिए हालांकि आप मशरूम की खेती अपने घर के बाहर कोई छायादार स्थानों में भी कर सकते हैं

मशरूम के प्रकार: वैज्ञानिकों के अनुसार पूरी दुनिया में मशरूम की 10000 से भी ज्यादा प्रजाति पाई जाती है पर इनमें से कुछ ही प्रजातियों का उपयोग हम अपने भोजन में करते हैं इनमे से 5 इस प्रकार हैं बटन मशरूम, पैडी स्ट्रॉ, स्पेशली मशरूम, दवाओं वाली मशरूम, धिंगरी या ओएस्टर मशरूम हैं। पर जब व्यक्ति व्यापारिक दृष्टिकोण से इसका उत्पादन करता है, तो वह ध्यान रखता है कि किस किस्म के मशरूम की अधिक मांग है, साथ ही कौन सी मशरूम अधिक पैदा वार देती है इस हिसाब से मशरूम की सिर्फ तीन प्रजाति है, जो अच्छी पैदावार देती है बटन मशरूम, पैडी स्ट्रॉ, धिंगरी या ओएस्टर मशरूम इस तीन तरह के मशरूम से अच्छा उत्पादन पाया जा सकता है

मृदा प्रबंधन
एक स्वस्थ मृदा, दीर्घोपयोगी कृषि का एक मुख्य घटक है अर्थात जब किसी साफ-सुथरी भूमि (मृदा) को पर्याप्त मात्रा में पानी व पोषक तत्व पाए जाते हैं, तब उसका परिणाम स्वरूप ऐसे पौधे उत्पन्न होते हैं, जो स्वयं को काफी हद तक पीड़कों व बीमारियों से बचा सकते हैं। अत: दीर्घ अवधि की उत्पादकता व स्थिरता को पाने के लिये, भूमि का संरक्षण एवं पोषित करना आवश्यक है। भूमि के संरक्षण की कुछ निम्नलिखित विधियां हैं जिनमें आवरण फसलों (कवर क्रॉप्स) का प्रयोग, खाद का प्रयोग, जुताई करने में कमी करना, मृदा में पाए गए जलवाष्प का संरक्षण, मृत मल्च इन सब विधियों द्वारा भूमि की जल धारण करने की क्षमता में वृद्धि होती है। हालांकि हमारे पास किस्मों में सुधार हेतु कृषि के लिए उपलब्ध भूमि सीमित है, फिर भी हमें इसी भूमि में खाद्यान्न, चारे, चीनी, तेल, रेशों, फलों व सब्जियों का अधिक उत्पादन करना है। ऐसा करने की एक महत्वपूर्ण विधि आनुवंशिकी एवं पौधे में जनन संबंधित विज्ञानों का सशक्त लागू करण है। इससे विद्यमान पौधों की किस्मों के स्तर में वृद्धि लाई जा सकती है। सही चयनित विधियां एवं पौधों में प्रजनन जैसी पारंपरिक विधियों के प्रयोग द्वारा ही फसलों के उत्पादन में वृद्धि देखी जा चुकी है।

दीर्घोपयोगी कृषि
दीर्घोपयोगी कृषि एक प्रकार की कृषि प्रणाली है, जो बिना भूमि की उत्पादकता का विनाश किए या पर्यावरण को भारी हानि पहुंचाए बिना वर्तमान काल की जनसंख्या को पर्याप्त खाद्यान्न एवं लाभ प्रदान कर सकती है। दीर्घोपयोगी कृषि प्रणालियां वे हैं जो कम से कम विषैली हैं, जो ऊर्जा का उचित संचालन करती हैं और इसके बावजूद निर्यात व लाभ के स्तर को बनाए रखती है अर्थात कम ऊर्जा की कृषि या जैविक कृषि। अत: दीर्घोपयोगी कृषि वह है जो…

  • लाभकारी उत्पादकता का समर्थन करती है।
  • पर्यावरण गुणवत्ता का संरक्षण करती है।
  • प्राकृतिक संपदा का कुशलतापूर्वक प्रयोग करती है।
  • उपभोक्ताओं को सही दाम वाले, अच्छे स्तर के उत्पादों को प्रदान करती है।
  • अनवीनीकृत होने वाली संपदा पर कम आश्रित होती है।
  • कृषकों व ग्रामीण समाजों के जीवन स्तर में सुधार लाती है।