October 27, 2020

चुनाव में भी धंधा मंदा है खादी के कुर्ता-पायजामे का

पटना, 16 अक्टूबर (एजेंसी)। चुनाव कोई भी हो, कारोबार में बहार आ जाती है। घाटे में चलने वाले कई कारोबार को इस समय गति मिल जाती है। छोटे से लेकर बड़े व्यवसायियों की चांदी रहती थी। मगर इस बार कोरोना काल में हो रहे बिहार विधानसभा चुनाव ने कारोबारियों को निराश किया है।
खासकर खादी कपड़े के व्यवसायियों को। नामांकन के समय खादी वस्त्रों की दर्जनों दुकानें गुलजार रहती थीं। अभी जबकि एक साथ दूसरे व तीसरे चरणों में नामांकन चल रहा, इन दुकानों में सन्नाटा है। पहले चुनाव में प्रतिदिन 50 हजार तक के खादी के कपड़े बेचने वाले इन दिनों बमुश्किल बोहनी कर पा रहे हैं। कोरोना की मार से जूझ रहे इन दुकानदारों को चिंता है कि ठंड में सूती खादी कपड़े डंप हो जाएंगे। व्यवसाय संभाले नहीं संभलेगा। कांटी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से नामांकन करने पहुंचे एक राजनीतिक दल के उम्मीदवार ने कहा, सिंबल के लिए बड़ा संघर्ष था। इस कारण लगातार पटना में रहना पड़ा। समय कम था, इसलिए पटना में ही चुनाव के लिए खादी के कपड़े तैयार करवा लिया। सिंबल मिला तो सीधे चुनाव मैदान में उतर गए। मीनापुर निर्वाचन क्षेत्र के एक उम्मीदवार की मानें तो पटना में खादी मॉल के खुलने से कई चीजें आसान हो गई हैं। साथ ही, वहां विकल्प व वेरायटी भी कई हैं। इस बार चुनाव के लिए मिले कम समय को देखते हुए कपड़े बनवाने का काम पटना में ही कर लिया।

टिकट बंटवारे में हुई देरी
मुजफ्फरनगर के एक खादी भंडार के संचालक ने कहा,इस बार नए समीकरण के कारण टिकट बंटवारे में देरी हुई। कौन लड़ेगा कौन नहीं, इस अनिश्चितता में नेता पटना में डटे रहे। नुकसान अन्य शहरों को हो गया, जबकि मुजफ्फरनगर तो खादी का बड़ा बाजार है। एक अन्य खादी भंडार के जय प्रकाश ठाकुर कहते हैं, पिछले चुनाव तक एक नेता आते थे तो साथ में उनके दर्जनों समर्थक। अपने लिए चार-पांच सेट कुर्ता-पायजामा का कपड़ा लेते तो समर्थकों को भी एक-एक दिलाते। थान तक खत्म हो जाता था। मोतीझील बाजार स्थित खादी ग्रामोद्योग केंद्र की दुकान का भी यही हाल है।

मानो चुनाव नहीं हो रहा। काउंटर संभाल रहे एक युवा विक्रेता की माने तो चुनाव के समय प्रतिदिन 50 हजार तक के कपड़े बिक जाते थे। अभी नियमित ग्राहक ही आ रहे। इस कारण पांच से दस हजार तक की ही बिक्री है। दुकानदारों ने अपना दुखड़ा बताया तो प्रत्याशियों की नब्ज को टटोलना भी जरूरी था। एक उम्मीदवार की मानें तो पहले कार्यकर्ता निस्वार्थ भाव से काम करते थे। इस कारण उनके लिये भी कपड़े बनवाए जाते थे। मगर, अब कार्यकर्ता प्रोफेशनल हो गए हैं। चुनाव प्रचार से लेकर बूथ मैनेजमेंट तक एक तरह से फीस देनी पड़ रही। अब कपड़े पर खर्च का झंझट कौन मोल ले। जिला खादी ग्रामोद्योग संघ के अध्यक्ष वीरेंद्र कुमार भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। वहीं, मुजफ्फरपुर की खादी को लेकर चिंतित भी हैं। कहते हैं, चुनाव के समय 25 से 30 लाख तक के खादी कपड़े बिकते थे। इस बार यह आंकड़ा डेढ़ से दो लाख तक नहीं पहुंच पाएगा। पटना में राजनीतिक दल के कार्यालयों के आसपास हैंडलूम की दुकानों से नुकसान पहुंचा है।