September 24, 2020

चुन चुन कर मारे जा रहे टिड्डियों के बच्चे

  • आफत सेे लडऩे में जुटे किसान और सरकार, योजना पर किया जा रहा है काम

सांध्य ज्योति संवाददाता
जयपुर, 29 अगस्त। प्रदेश में इन दिनों टिड्डियों के बच्चे यानि हॉपर्स ने किसानों और राज्य सरकार की चिन्ता बढ़ा रखी है। मानसून की बारिश के बाद करोड़ों की तादाद में हॉपर्स जमीन से बाहर निकल रहे हैं और फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कृषि विभाग और टिड्डी चेतावनी संगठन लगातार इन हॉपर्स को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं और दावा यह भी किया जा रहा है कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है। टिड्डी चेतावनी संगठन के उपनिदेशक के.एल.गुर्जर के मुताबिक जैसलमेर, पाली, नागौर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर और चूरू आदि जिलों में बड़े स्तर पर हॉपर्स का प्रकोप था लेकिन अब कीटनाशक के छिड़काव के जरिए इन्हें नियंत्रित किया जा चुका है। कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. सुआलाल जाट का भी कहना है कि बड़े स्तर पर हॉपर्स का प्रकोप हुआ लेकिन समय पर इन्हें नियंत्रित करने के प्रयास शुरू कर दिए गए और अब चुनिंदा जगहों पर हॉपर्स छितराई अवस्था में देखने को मिल रहे हैं। इन हॉपर्स को नियंत्रित करने के प्रयास लगातार जारी है।

इस तरह होता है खात्मा
डॉ. सुआलाल जाट के मुताबिक टिड्डियों के खात्मे के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया ही हॉपर्स को खत्म करने के लिए अपनाई जाती है। रोपाइरीफॉस, लेम्बडासाइहेलोथ्रिन और मैलाथियान आदि कीटनाशकों के छिड़काव के जरिए इन्हें खत्म किया जाता है। अभी बड़े स्तर पर टिड्डियों और हॉपर्स के सर्वे का कार्य कृषि विभाग द्वारा किया जा रहा है। सर्वे करने वाली गाड़ी में ही कीटनाशक उपलब्ध होता है। जहां भी हॉपर्स नजर आते हैं वहां तत्काल कीटनाशक का छिड़काव कर उन्हें खत्म कर दिया जाता है। चूंकि हॉपर्स के पंख विकसित नहीं होते और वो उड़ नहीं सकते लिहाजा उनका खात्मा करना टिड्डियों के मुकाबले आसान होता है।

खाई खोदने की पारम्परिक तकनीक भी कारगर
कीट विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. अर्जुन सिंह बालोदा का कहना है कि खाई खोदकर हॉपर्स को नियंत्रित करने वाली पारम्परिक तकनीक भी कारगर है। इसमें खेत के आसपास करीब 2 फीट गहरी खाई खोद दी जाती है जिससे हॉपर्स इसमें गिर जाते हैं और इससे बाहर नहीं निकल पाते। इसके बाद कीटनाशक छिड़काव के जरिए उन्हें नष्ट कर दिया जाता है । इससे कम कीटनाशक इस्तेमाल होता है और फसल भी कीटनाशक से सुरक्षित रहती है।

मोबाइल एप भी तैयार
हॉपर्स की मॉनिटरिंग के लिए कृषि विभाग द्वारा मोबाइल एप तैयार किया गया है। इस एप के जरिए नियंत्रण में लगे कर्मचारियों को हॉपर्स के निकलने की अग्रिम जानकारी मिलती है जिससे नियंत्रण का कार्य प्रभावी हो जाता है। संसाधनों की अगर बात की जाए तो टिड्डी नियंत्रण में लगे संसाधन ही हॉपर्स के नियंत्रण में उपयोग लिए जा रहे हैं। सर्वेक्षण के लिए 120 और नियंत्रण के लिए 45 वाहन लगे हैं। इसके साथ ही ट्रैक्टर, माउंटेड स्प्रेयर और पानी के टैंकर भी उपलब्ध करवाए गए हैं। कृषि आयुक्तालय के साथ ही सभी जिलों में कंट्रोल रुम कार्य कर रहे हैं जिन पर टिड्डियों और हॉपर्स की सूचना आती है।