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जब जिन्ना गए थे तो सड़े अंडे, बापू का दिल खोलकर स्वागत

नई दिल्ली, 2 अक्टूबर (एजेंसी)। महात्मा गांधी अपनी पूरी जिंदगी में केवल एक बार कश्मीर गए थे। यह तब की बात है जब देश आजाद होने ही वाला था और कश्मीर किसके साथ जाएगा, यह मुद्दा जबरदस्त चर्चा में था। पूरी दुनिया की नजर कश्मीर के हालात पर थी। ऐसे में गांधीजी को वहां के हालात काबू करने के लिए जाना पड़ा। बापू के स्वागत में पूरी घाटी उमड़ पड़ी। लोगों का ऐसा जमावड़ा वहां पहले कभी नहीं देखा गया। इसके बाद गांधीजी ने अपनी राय जाहिर की कि कश्मीर का क्या होना चाहिए। इससे ठीक पहले मोहम्मद अली जिन्ना भी वहां गए थे, जिन्हें लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा था। जिन्ना पर सड़े अंडे फेंके गए थे। तब कश्मीर में शेख अब्दुल्ला ने महाराजा हरि सिंह के खिलाफ आवाज तेज कर दी थी। शेख अब्दल्ला की सबसे बड़ी ताकत थे उनके दोस्त जवाहरलाल नेहरू। तब लगभग तय हो गया था कि नेहरू ही भारत के पहले प्रधानमंत्री बनेंगे। महाराजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला पर बड़ी कार्रवाई करते हुए उन्हें जेल में डाल दिया था। उनकी पैरवी करने नेहरू पहुंचे तो उन्हें गेस्ट हाउस से ही बाहर नहीं निकलने दिया गया। इन बिगड़ते हालात की जानकारी माउंटबेटन को दी गई, जिन्हें उस समय भारत और पाकिस्तान के बंटवारे का जिम्मा सौंपा गया था। माउंटबेटन को लगा कि महात्मा गांधी से बेहतर कौन हो सकता है? उन्होंने बापू से गुजारिश की कि वे एक बार कश्मीर का दौरा करें।

कश्मीर को लेकर यह था बापू का रुख
यह पहला मौका था जब गांधी कश्मीर गए। उनसे पहले जिन्ना भी गए थे, लेकिन लोगों ने उन्हें जमींदारों का वफादार मानते हुए विरोध किया और टमाटर-अंडे बरसाए। 77 साल की उम्र में गांधी कश्मीर के मुश्किल सफर पर निकल पड़े। रावलपिंडी के रास्ते एक अगस्त, 1947 को कश्मीर पहुंचे। उनका साफ कहना था, मैं किसी को समझाने नहीं आया हूं। मैं नहीं कहूंगा कि कश्मीर भारत में रहे या पाकिस्तान में शामिल हो जाए, लेकिन एक बात जरूर है। कश्मीर का यह फैसला कोई राजनेता या महाराजा नहीं करेगा, बल्कि कश्मीर के लोग करेंगे। राजा कल मर जाएगा, तो क्या होगा। रहना तो जनता को है।जनता ने तो बापू को पलकों पर बैठाया ही, महाराजा हरि सिंह ने भी आवभगत में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने इस दौरे में गांधी ने कश्मीर को लेकर भारत का रुख साफ कर दिया। उन्होंने सारे अधिकार जनता को दिए, जो पहले से उनके साथ थी। इसके बाद वहां के हालात सुधरे। शेख अब्दुल्ला को महाराजा ने रिहा कर दिया। कश्मीर के मुसलमानों, हिंदूओं, कश्मीरी पंडितों और सिखों ने बापू की बात मानी और मिलकर रहने का संकल्प किया। इतिहास गवा है कि इसके बाद ही कश्मीर आजाद भारत का हिस्सा बना।