September 28, 2020

जितिया व्रत से पूर्व क्यों खाई जाती है मछली

संतान की खुशहाली और उसकी लंबी कामना के लिए जीवित्पुत्रिका या जितिया का व्रत किया जाता है। आश्विन मास की अष्टमी को ये निर्जला व्रत होता है। उत्सव तीन दिनों का होता है। सप्तमी का दिन नहाय-खाय के रूप में मनाया जाता है, अष्टमी को निर्जला उपवास रखते हैं, फिर नवमी के दिन व्रत का पारण किया जाता है। इस व्रत को शुरू करने से पहले अलग-अलग क्षेत्रों में खान-पान अपनी क्षेत्रीय परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि इन चीजों के सेवन से व्रत शुभ और सफल होता है। संतान की खुशहाली और उसकी लंबी कामना की लिए जितिया का व्रत किया जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार के मिथलांचल सहित, पूर्वांचल और नेपाल में काफी लोग इस व्रत को करते हैं।
इस व्रत को शुरू करने को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में खानपान की अपनी अलग-अलग परंपरा है। नहाय-खाय के दिन मछली खाने की परंपरा है। मछली खाना वैसे तो पूजा-पाठ के दौरान मांसाहार को वर्जित माना गया है, लेकिन बिहार के कई क्षेत्रों में जैसे कि मिथलांचल में जितिया व्रत के उपवास की शुरुआत मछली खाकर की जाती है, इसके पीछे चील और सियार से जुड़ी जितिया व्रत की एक पौराणिक कथा है। इस कथा के आधार पर मान्यता है कि मछली खाने से व्रत की शुरुआत करनी चाहिए और यह करना बहुत शुभ माना जाता है। इसके अलावा गेंहू की बजाय मड़ूआ के आटे की भी रोटी बनाने का भी प्रचलन है और इन रोटियों को खाने का भी प्रचलन है।
बिल्कुल छठ की तरह ही जिउतिया में नहाय खाय होता है। इस दिन महिलाएं सुबह-सुबह उठकर गंगा स्नान करती हैं और पूजा करती हैं। अगर आपके आसपास गंगा नहीं हैं तो आप सामान्य स्नान कर भी पूजा का संकल्प ले सकती हैं। नहाय खाय के दिन सिर्फ एक बार ही भोजन करना होता है। इस दिन रात को छत पर जाकर चारों दिशाओं में कुछ खाना रख दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि यह खाना चील व सियारिन के लिए रखा जाता है।

तिथि और शुभ मुहूर्त
इस बार आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि 9 सितंबर की रात में 9 बजकर 46 मिनट पर प्रारंभ होगा और 10 सितंबर की रात 10 बजकर 47 मिनट तक रहेगा।10 सितंबर को अष्टमी में चंद्रोदय का अभाव है, इसी दिन जिउतिया पर्व मनाया जाएगा।