September 24, 2020

…तस्मै श्री गुरुवे नम:

ध्यानमूं गुरो्मूर्ती: पूजामूलं गुरो: पदम्।
मन्त्रमूलं गुरोवाक्यम् मोक्षमूलं गुरो: कृपा।।
‘तस्मै श्री व्यासाय नम:’

व्यासोच्छिष्टम् जगत् सर्वम् अर्थात् महर्षि व्यास के बाद लिखा गया संसार का सम्पूर्ण साहित्य व्यास की पुनरावृत्ति ही है। यह वचन साहित्य जगत के लिए सर्वथा सत्य के रुप में प्रतिपादित है। महर्षि व्यास ने वेदों के विभागों का विश्लेषण कर उसे मन्त्र, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषदों के रूप में पृथक-पृथक किया। वेदों के मन्त्र भाग को ऋग, यजु, साम और अथर्व वेद के रूप में चार भागों में बांटा तथा पुराणों को भी अठारह ग्रन्थों के रूप में संकलित करते हुए जन सामान्य के लिए वेद तत्व को सरल भाषा में प्रस्तुत किया। ऐसे अद्भुत व्यक्तित्व के धनी महर्षि कृष्ण द्वैषायन व्यास की यह जयन्ती भारतीय समाज में गुरू पूर्णिमा के रूप में प्राचीन काल से एक सांस्कृतिक उत्सव के रूप में स्वीकार कर मनाये जाने की परम्परा रही है। अत: इस पर्व पर हमें उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करनी चाहिए। यह दिन मनवन्तर का आदि दिन भी माना जाता है। भ्रमणशील सन्त समाज का चतुर्मास व्रत का आरम्भ भी इसी दिन से होता है। प्राचीन काल में परिवहन के सीमित साधनों के कारण वर्षा ऋतु आरम्भ होने पर संत समाज चार मास तक किसी एक स्थान पर रूककर तपोनुष्ठान किया करते थे। आज भी यह परम्परा प्रचलन में है।
गुरू: ब्रह्मा गुरू: विष्णु गुरूर्देवो महेश्वर: 7
गुरू: साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नम: ।।
भारतीय समाज गुरू को देवतातुल्य मानता रहा है। गुरू शब्द दो अक्षरों गु+रू का योग है अर्थात अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला। प्राचीन काल में राजशाही सत्ता के समय में भी राज्य की व्यवस्था का संचालन राजा द्वारा गुरू के परामर्श से किए जाने के अनेक ऐतिहासिक प्रसंग साहित्य में मिल जाते हैं। अनेकों अवसरों पर गुरू के परामर्श द्वारा ही राज्य की प्राकृतिक एवं अन्य समस्याओं का समाधान गुरू आशीर्वाद से ही मिला है, भगवान राम के गुरू वशिष्ठ, विश्वामित्र, भगवान कृष्ण के गुरू ऋषि सांदीपनी आदि का उल्लेख समय-समय पर कथाओं में सुनने को मिलता है। आचार्य चाणक्य द्वारा चन्द्रगुप्त को, समर्थ गुरू रामदास द्वारा शिवाजी महाराज को तराशा जाना, गुरू रामकृष्ण परमहंस द्वारा नरेन्द्र (स्वामी विवेकानन्द) के रूप में निखारा जाना। ऐसे अनेकों उदाहरण हमारे समक्ष हैं जिनके द्वारा इस देश व समाज को समय-समय पर नेतृत्व व मार्गदर्शन प्रदान किया है।
यंद्यपि आज के समय में गुरू शिष्य परम्परा लुप्तप्राय: हो चुकी है। परिणाम स्वरूप विद्यालयों-महाविद्यालयों में धनराशि देकर पढऩे वाले छात्रों के मन में अपने गुरूओं के प्रति एक साधारण नौकर से अधिक सम्मान या भाव पैदा नहीं होता। प्राचीन भारत में गुरू वर्ग के प्रति जो दृढ़ व अपार श्रद्धा का भाव शिष्य के हृदय में होता था वह आज भी हमारे लिए गौरव का विषय है। इनका स्मरण हमारे मनों में तपोनिष्ठ सभ्यता की कल्पना जगाता है, जहां आज की तरह विद्या व्यवसाय नहीं होता था। जिसमें निर्धनता के कारण कोई विद्यार्थी शिक्षा से वंचित नहीं होता था, जिसमें राजा-रंक का भेदभाव नहीं होता था। एक वृक्ष के नीचे कुशा-आसनों पर बैठ कर सभी विद्यार्थियों को एक साथ विद्याध्ययन कराया जाता था।
‘सादा जीवन उच्च विचार’ गुरू कुल का मूल मंत्र होता था। तप और त्याग जिसका पवित्र ध्येय होता था। कबीर, तुलसी, मीरा, नानक आदि ने गुरू महिमा के बारे में पर्याप्त साहित्य लिखा है। स्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा का प्रारम्भ ही गुरू वन्दना से करते हैं।
‘श्री गुरू चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार’
वहीं कबीरदास जी कहते हैं-
गुरू गोबिन्द दोउ खड़े, काके लागूँ पॉय।
बलिहारी गुरू आपने, जिन गोबिन्द दियो बताय।।
इस सामाजिक पर्व के प्रति आज व्यक्ति समाज उदासीन है, यह अत्यन्त दु:ख का विषय है, प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे उपयोगी और महत्वपूर्ण पर्व की पुन: स्थापना का सद्भाव मन में जागृत कर भारत में सद्शिक्षा के प्रचार-प्रसार में अपनी नयी पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त करना सनातन परंपरा में योगदान होगा।
जयतु संस्कृतम्-जयतु भारतम्।

-ह्रदेश चतुर्वेदी
राजस्थान संस्कृत अकादमी