October 25, 2020

पंजाब में भी भाजपा एकला चलो रे…तर्ज पर

नीलम जीना

नई दिल्ली, 19 सितम्बर। केंद्रीय मंत्री और अकाली दल नेता सुखबीर सिंह बादल की पत्नी हरसिमरत कौर बादल के केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफे से हालांकि केंद्र की मोदी सरकार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है लेकिन अकाली दल के साथ भाजपा की दोस्ती अब लंबी चलने वाली नहीं है। भाजपा को अब अकाली दल की उतनी जरूरत नहीं है जितनी 2019 लोकसभा चुनाव तक थी। इसलिए भाजपा महाराष्ट्र की तरह पंजाब में भी अकाली दल की बैसाखी उतार कर विधानसभा चुनावों में अपने दम पर भी मैदान में उतर सकती है। भाजपा ने इसके लिए अकाली दल से अलग हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखदेव सिंह ढींढसा गुट और स्थानीय स्तर पर कुछ छोटे राजनीतिक समूहों पर डोरे डालने शुरू कर दिए हैं।

अकाली दल दोहरे दबाव में
अकाली दल दोहरे दबाव में है। एक तरफ कृषि क्षेत्र में सुधार के प्रस्तावित विधेयकों को लेकर गरमाई पंजाब के किसानों की सियासत ने उसे केंद्र सरकार से बाहर आने को मजबूर किया है लेकिन अभी अकाली दल ने मोदी सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया है और एनडीए का हिस्सा है। अगर हरसिमरत के इस्तीफे के बावजूद केंद्र सरकार कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए लाए जाने वाले तीनों अध्यादेशों को संसद से कानून बनवा लेती है, जो कि उम्मीद है बनवा लेगी, तो अकाली दल के सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट होगा कि वह केंद्र की मोदी सरकार को समर्थन दे या न दे। अगर अकाली दल यह नहीं करता है तो पंजाब की किसान राजनीति में उसके लिए हरसिमरत कौर का इस्तीफा सिर्फ दिखावे का ही साबित होगा और अगर वह एनडीए से बाहर आता है तो राज्य में भी भाजपा के साथ उसका गठबंधन टूट जाएगा। तब 2022 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के मुकाबले अकाली दल और भाजपा को अलग-अलग लडऩा होगा। पिछले लोकसभा चुनाव से ही भाजपा नेतृत्व को लगातार यह जानकारी अपने संगठन के सूत्रों और संपर्कों से हो रही थी कि पंजाब में प्रकाश सिंह बादल जैसी लोकप्रियता और समर्थन उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल के पास नहीं है इसलिए अकाली दल का जनाधार सिमटता जा रहा है और अकाली दल भाजपा के लिए भी बोझ जैसा बनता जा रहा है।