September 20, 2020

परशुरामपुरी मठ : संत-महंतों ने जागृत कर रखा है ऐतिहासिक धाम

सांध्य ज्योति संवाददाता
जयपुर, 31 अगस्त। सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए आदि शंकराचार्य द्वारा चार पीठों की स्थापना की गई थी, इनकी रक्षार्थ साधु अखाड़ों का गठन हुआ। अखाड़ों के अधीन मठों का संचालन किया जाता है। मठ का अर्थ ऐसी संस्थाओं से है जहां गुरु अपने शिष्यों को शिक्षा, उपदेश इत्यादि प्रदान करते हैं। यह गुरु प्राय: धर्म गुरु होते हंै। चौमूं क्षेत्र में पंच दशनाम जूना अखाड़ा से सम्बद्ध उदयपुरिया परशुरामजी का मठ व चिमनपुरा स्थित बाग महादेव स्थल आज भी संत-महंतों से जागृत हो रहा है। करीब 1166 साल पूर्व परशुरामपुरी महाराज ने उदयपुरिया गांव में जीवित समाधि ली थी। कहा जाता है कि समाधि वाले दिन उज्जैन में क्षिप्रा नदी के किनारे दर्शन दिए थे। समाधि स्थल पर अखण्ड जोत प्रज्ज्वलित है। कहा जाता है कि परशुरामपुरी बाग महादेव में समाधि लेने वाले थे परन्तु वहां चीटियों की नाल निकल आने पर उदयपुरिया मठ में ही समाधि लेनी पड़ी। परशुरामपुरी के बाद के गुरुजनों के नाम से उदयपुरिया, चिमनपुरा, अणतपुरा गांव बसाए गए। श्रद्धालुओं का ऐसा मानना है कि मठ में आने वाले की मनोकामना पूर्ण होती है। मठ के संत नरसिंहपुरीजी भक्तजनों की समस्या का निवारण करते हैं। हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को यहां विशाल मेला भरता है। इस बार कोरोना महामारी के कारण मेले का आयोजन नहीं किया गया। वर्तमान में उदयपुरिया के प्राचीन मठ का जीर्णोद्धार कर विशाल मंदिर निर्माण कार्य प्रगति पर है। किसी समय यह मठ शिखरबद्ध हुआ करता था। मुगलकाल में औरंगजेब ने यहां से गुजरते हुए मठ को तथा बाग महादेव मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया था।

52 मठ हैं अधीन
परशुरामपुरी मठ के अधीन 52 मठ आते हैं। भगवानपुरी महाराज मठ की देखरेख करते हैं। उदयपुरिया से कुछ दूरी पर चिमनपुरा गांव में बाग महादेव स्थल पर ब्रह्मलीन संतों की समाधियां (छतरियां) बनी हुई है जहां महादेव का प्राचीन मंदिर स्थित है। महेन्द्रपुरीजी यहां पूजा-पाठ करते हैं। केदारपुरी के अनुसार रमणीय व हरियाली से घिरे बाग महादेव मंदिर में सवामणियां, सहस्रघट जैसे आयोजन होते रहते हैं।