September 22, 2020

पितरों के मोक्ष प्राप्ति के लिए जरूरी है इंदिरा एकादशी व्रत

इंदिरा एकादशी व्रत पितृ पक्ष में रखा जाता है। इसलिए पितरों के मोक्ष प्राप्ति के लिए यह एकादशी व्रत जरूरी होता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी को इंदिरा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस साल यह एकादशी तिथि 13 सितंबर को पड़ रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इंदिरा एकादशी व्रत पितरों की मुक्ति की कामना के लिए किया जाता है।
शास्त्रों में इंदिरा एकादशी को लेकर यह कहा गया है कि जो भी व्यक्ति यह व्रत का पालन सच्ची श्रद्धा के साथ करता है तो व्रती के पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान विष्णु जी समस्त जीवों को मुक्ति दिला सकते हैं। यह व्रत भगवान विष्णु की आराधना, पितरों को मोक्ष प्राप्ति और भगवत दर्शन की कामना से किया जाता है। यह व्रत सभी एकादशी व्रत से पावन माना जाता है।

इंदिरा एकादशी पूजा मूहूर्त

  • एकादशी प्रारम्भ: 13 सितंबर की सुबह 4 बजकर 13 मिनट
  • एकादशी समाप्त: 14 सितंबर की सुबह 03 बजकर 16 मिनट तक
  • पारण का समय: 14 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 59 मिनट से शाम 3 बजकर 27 मिनट तक

पूजा विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कर सूर्यदेव को अघ्र्य दें। इसके बाद अपने पितरों का श्राद्ध करें। भगवान विष्णु की पूजा-आराधना करें। ब्राह्मण को फलाहार का भोजन करवायें और उन्हें दक्षिणा दें। इस दिन इंदिरा एकादशी व्रत कथा सुनें। एकादशी व्रत द्वादशी के दिन पारण मुहूर्त में खोलें।

व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने इंदिरा एकादशी व्रत कथा का महत्व धर्मराज युद्धिष्ठर को बताया था। उनके अनुसार, सतयुग के समय की बात है। इंद्रसेन नाम का एक राजा था जिसका महिष्मति राज्य पर शासन था। राजा के राज्य में सभी प्रजा सुखी थी और राजा इंद्रसेन भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक बार राजा के दरबार में देवर्षि नारद पहुंचे तब राजा ने उनका स्वागत सत्कार किया और आने का कारण पूछा। तब देवर्षि नारद ने बताया कि मैं यम से मिलने यमलोक गया था, वहां मैंने तुम्हारे पिता को देखा। वहां वह अपने पूर्व जन्म में एकादशी व्रत के खण्डित होने का दंड भोग रहे हैं। उन्हें तमाम तरह की यातनाएं झेलनी पड़ रही है। इसके लिए उन्होंने आपसे इंदिरा एकादशी का व्रत करने को कहा है ताकि उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो सके। तब राजा ने नारद जी से इंदिरा एकादशी व्रत के बारे में जानकारी देने को कहा। देवर्षि ने आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी व्रत की विधि के पालन के बारे में बताया, जिससे उनके पिता की आत्मा को शांति मिली और बैकुंठ की प्राप्ति हुई।