September 27, 2020

बातें बनाना बुद्धिमान बनने का जरिया

माना जाता है, बातें बनाना बुरी बात है। लोग अक्सर कहते भी हैं, इस तरह बातें बनाने से बात नहीं बनेगी। लोग बातूनी लोगों को अक्सर व्यंग्य से इस तरह वाक्पटु कहते हैं मानो उन्हें चिढ़ा रहे हों। लेकिन बातें बनाना या ज्यादातर लोगों से संवाद स्थापित कर लेना न तो किसी बेवकूफी की निशानी है और न ही इससे कोई नुकसान है। भले ही लोग कहते हों कि बातें बनाने से कुछ नहीं होगा, मगर वैज्ञानिकों ने एक विस्तृत शोध के जरिए साबित किया है कि बातें बनाना न सिर्फ बुद्धिमान बनने का जरिया है, बल्कि निरंतर और हर तरह के लोगों से संवाद कला में माहिर होने वाले लोग जीनियस भी साबित होते हैं।
मिशिगन यूनिवर्सिटी (अमेरिका) ने एक विस्तृत शोध में पाया है कि जब आप रोजाना 10 मिनट किसी के साथ किसी भी विषय पर बातचीत करते हैं तो इससे न केवल आप धीरे-धीरे संवाद कला में माहिर होते जाते हैं, बल्कि इससे याद्दाश्त भी तेज होने लगती है और बुद्धिमत्ता भी बढऩे लगती है। इस तरह याददाश्त और बुद्धिमत्ता को सक्रिय बनाए रखने के लिए लोगों के साथ बातचीत करना जरूरी है। यहां तक कि वर्ग पहेलियां भी इसके मुकाबले कम असरकारक हैं।
इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च ऑफ मिशिगन यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक ऑस्कर याबरी, जो इस शोध के साथ जुड़े थे, उनके मुताबिक दिमागी कसरत स्वास्थ्य के लिए उतनी ही जरूरी है जितनी जिस्मानी कसरत। दिमागी कसरत का सबसे आसान और उर्वर तरीका है विभिन्न किस्म के लोगों के साथ प्रतिदिन कम-से-कम 10 मिनट बातचीत करना। शोध में मनोवैज्ञानिकों ने पाया है कि मानसिक कार्यप्रणाली और सामाजिक व्यवहार में सीधा संबंध होता है। इसलिए अगर सामाजिक रूप से आप सक्रिय रहते हैं तो मानसिक रूप से भी स्वस्थ और सक्रिय रहते हैं। इसे साबित करने के लिए बड़े पैमाने पर शोध किया गया और जो लोग प्रतिदिन या हफ्ते में कम-से-कम 4 बार नियमित रूप से लोगों के साथ 10 से 20 मिनट का संवाद स्थापित करते थे, वे बुद्धिमान और मानसिक रूप से ज्यादा सचेत पाए गए, वो उन लोगों के, जो लोगों से मिलने-जुलने और संवाद करने से कतराते हैं तथा अपने आप में ही मस्त रहते हैं।
शोध में यह भी साबित हुआ कि संवाद करने में उदासीन रहने वाले लोग, फिर चाहे वे प्रखर वैज्ञानिक ही क्यों न हों, उनकी याददाश्त कमजोर हो जाती है। यह महज संयोग नहीं है कि दुनिया के ज्यादातर महान वैज्ञानिकों को कमजोर स्मृति का शिकार पाया गया है। शायद इसके पीछे कारण यही है कि ये वैज्ञानिक आमतौर पर अपनी दुनिया में ही खोए रहते हैं। अपने काम में डूबे रहते हैं। इससे अपने काम में तो ये माहिर होते हैं, लेकिन अपने क्षेत्र के हीरो जीवन के क्षेत्र में जीरो साबित हो जाते हैं। दूसरी तरफ पाया गया है कि ऐसे लोग जो अक्सर लोगों के साथ संवाद-संपर्क में रहते हैं, उनकी स्मृति काफी तेजी होती है। यही वजह है कि राजनेताओं, टेलीफोन ऑपरेटरों, कंपनियों के स्वागताधिकारियों, कंडक्टरों, दुकानदारों और उन तमाम पेशे के लोगों की याददाश्त काफी तेज होती है, जो दिन में कई बार अलग-अलग तरह के लोगों के संवाद-संपर्क में आते हैं।
इस संवाद से एक बड़ा फायदा यह होता है कि इससे विवरण को समझने के नए कोण हासिल हो जाते हैं और विभिन्न दृष्टिकोणों से रू-ब-रू होने पर अपने दृष्टिकोण की गहराई का पता चल जाता है। इसके साथ ही उसे दुरुस्त करने का रास्ता भी दिख जाता है। सवाल है आखिर अलग-अलग या ज्यादातर लोगों से संवाद रखने से स्मृति कैसे तीव्र होती है और बुद्धिमत्ता में इजाफा क्यों होता है?
किसी के साथ संवाद करना दरअसल अपनी समझ को अनुमान के दायरे से निकालकर मान्यता के मैदान में उतार देना है। अगर ज्यादातर लोग उसकी काट नहीं ढूँढ पाते तो आपकी समझ जीत जाती है और अगर लोग आपकी समझ को टिकने नहीं देते तो आपको अपनी समझ को और बेहतर व तर्कपूर्ण बनाने की चुनौती हासिल होती है।