October 26, 2020

भाजपा सांसद उतरेंगे मैदान में

  • किसान आंदोलन- कृषि विधेयकों पर बढ़ते धमाल के बाद पार्टी ने बनाई रणनीति
  • प्रमोद कुमार

नई दिल्ली, 30 सितम्बर। किसानों के लिए लाए गए कृषि उत्पाद व्यापार एंव वाणिज्य विधेयक 2020, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर अनुबंध विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक बिल पारित होने के बाद देश भर में किसानों का विरोध प्रर्शदन उग्र रूप ले रहा है। किसानों को इन तीनों बिलों में न्यूनतम समर्थन मूल्य और कारपोरेट फार्मिंग से परहेज है जिसके लिए कांग्रेस शासित राज्यों ने इन विधेयको को दरकिनार कर नए रास्ते निकालने से लेकर उच्चतम न्यायालय में गुहार तक की कवायद चला रखी है। इससे सत्तारूढ़ दल भाजपा थोड़ी रक्षात्मक हो गई है। प्रधानमंत्री मोदी विधेयक पर भाजपा कार्यकर्ताओं की भूमिका चाहते हैं। उनके निर्देश पर पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पार्टी के सांसदों से कहा है कि वे अपने लोकसभा क्षेत्रों में अगले पनद्रह दिनों का कार्यक्रम का ब्यौरा मुख्यालय को दें। इस कार्यक्रम के दौरान वे यह सुनिश्चित करें कि उन्हें लोगों के बीच जाकर किसानों से जुड़े पारित विधेयकों के बारे में विस्तार से समझाना होगा कि यह विधेयक विपक्ष द्वारा कथित तौर पर किसानो को गुलाम नही बल्कि आमदनी बढ़ाने का जरिया है।

अविश्वास के दो मुख्य कारण
दरअसल इस अविश्वास के दो मुख्य कारण हैं। अकाली दल कोटे से केन्द्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल का इस्तीफा और दूसरा कृषि मंत्री नरेन्द्र तोमर का यह बयान कि इन विधयकों में तो एमएसपी का कुछ लेना देना नहीं है पर इसका ख्याल रखा जाएगा। वरिष्ट पत्रकार पी.साईंनाथ कहते हैं, प्रधानमंत्री इन तीन बिलों के साथ एक बिल और लाते जो न्यूनतम समर्थन मूल्य को कभी लुप्त ना होने की गारंटी देता हो। यह बिल गारंटी देता हो कि बड़े व्यापारी या कम्पनिंया या कोई भी नया खरीददार एमएसपी के कम दाम पर माल नहीं खरीद सकेंगें तो बात बन सकती है। जब तक यह सरकार किसानों को यह आश्वासन नहीं देगी,यह संशय बना रहेगा। किसानों के बीच भ्रम है कि कारपोरेट फार्र्मिंग से उनकी जमीन छिन जाएगी। हांलाकि सरकार कहती है कि बिल में साफ लिखा है कि किसानों की जमीन बिक्री,लीज या गिरवी रखने पर पूरी तरह प्रतिबंधित है। समझौता फसलों का होगा जमीन का नहीं। पर किसानों का डर है कि कारपोरेट फार्मिंग में कम्पनियां अपने अशंधारको का ज्यादा ख्याल रखेंगी। फिर लिखित दस्तावेजों को आवश्यक नही माना गया है। वामपंथी नेता अतुल अंजान कहते हैं कि तीसरी चिंता भंडारण को लेकर है। विधेयक में निजी भंडारण की अंतिम सीमा नहीं है। भंडारण का सबसे बड़ी ऐजेंसी भारतीय खाध निगम ने भंडार बनाने लगभग बंद कर दिये हैं।

रोज करनी होंगी सभाएं
पार्टी को सांसदो को दिए गए निर्देश के साथ कृषि विधेयकों पर साधारण शब्दों में व्याख्या भी दी गई है ताकि वे सरल भाषा में लोगों को समझा सकें। पार्टी के सख्त निर्देश हैं कि सांसदों को प्रत्येक दिन लगभग पांच से छह छोटी सभाएं करनी होगी । रात्रि विश्राम के दौरान भी किसानों को इन विधेयकों के जरिये होने वाले लाभ के बारे में बताना होगा। इसके साथ ही पार्टी हाईकमान ने उनसे कार्यक्रमों की वीडियो रिकार्डिंग को प्रमाण के तौर पर रखने को कहा है। भाजपा सूत्रों का कहना है कि पार्टी को यह विश्वास है कि जब तक धान की खरीद होनी शुरू होगी तब तक यह भ्रम की स्थिति रह सकती है। इसके बाद किसानों को मिलने वाले लाभ से सारी भ्रांतिया अपने आप ही दूर हो जाएंगी। इस बीच किसानों के आंदोलन को कमजोर करना पार्टी का लक्ष्य है जिसके लिए सांसदों को अपने क्षेत्र में किसानों के बीच जाने को कहा गया है।

मोदी कर चुके हैं खुलासा
खुद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि इन तीन बिलों के पास होने के बाद किसानों को अपना उत्पाद बेचने की दी गई स्वत्रंतता के बीच विपक्ष ने किसानों में यह डर बैठा दिया गया कि उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य की सूची से बाहर कर दिया जाएगा जिसकी वजह से एमएसपी के लाभान्वित किसान और किसानों के बीच काम करने वाले आढ़तियों को डर है कि उन्हें कमीशन नही मिल पाएगा। दूसरा डर यह है कि कुछ औधोगिक घराने,जिन्होंने भण्डारण की क्षमता बढ़ायी है,वे किसानों से सीधे खरीद करेगें। बड़े किसानों के इस डर से बिल्कुल अलग छोटे और सीमान्त किसानों को अपने उत्पाद पर न्यूनतम सर्मथन मूल्य के बराबर भी दाम नही मिल पाएगा। इसका मिलाजुला असर है कि पंजाब में किसान आंदोलन ज्यादा उग्र है।