November 24, 2020

मायावती का यू-टर्न भाजपा को पहुंचा सकता है लाभ

विशेषज्ञों की राय

नई दिल्ली, 6 नवम्बर (एजेंसी)। चंद विधायकों की बगावत से बौखलाईं बसपा प्रमुख मायावती ने प्रदेश की राजनीति में नए समीकरणों के बीज बो दिए। हाल ही के राज्यसभा चुनाव में सपा ने उनके छह विधायकों को तोड़ा तो उन्होंने कह डाला कि बसपा, विधान परिषद चुनाव में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को सबक सिखाने के लिए भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देने से भी गुरेज नहीं करेगी। हालांकि इस बयान के नुकसान को मायावती ने भांप लिया, लिहाजा यू-टर्न लेते हुए सफाई दी है कि भले ही वह राजनीति से संन्यास ले लें, लेकिन भाजपा के साथ गठबंधन नहीं करेंगी। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या मायावती का यू-टर्न उनकी पहले जैसी स्थिति बहाल कर सकता है? बसपा से रूठा मुस्लिम सपा में ही आएगा। यह संभव भी है कि मुस्लिम एकतरफा अखिलेश को मजबूत करने के लिए चल पड़े। जानकारों का मानना है कि यह हालात तो सबसे ज्यादा भाजपा के लिए फायदेमंद होंगे, क्योंकि बहुत संभावना है कि मुस्लिमों की एक राह पर चाल देख विधानसभा चुनाव के वक्त ध्रुवीकरण के आसार बन जाएं। वह ध्रुवीकरण भाजपा के लिए इसलिए भी लाभदायक हो सकता है, क्योंकि अपने काम और नीतियों से भगवा दल, सपा के पिछड़े और बसपा के दलित वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा चुका है। पिछले दो लोकसभा और एक विधानसभा चुनाव के परिणाम इसका सुबूत भी हैं।

मायावती दोराहे पर
मायावती आखिर ऐसे दोराहे तक पहुंचीं कैसे इसे लेकर भी चर्चा है। 2012 में सत्ता गंवाने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी शून्य पर सिमटकर रह गई थी। 2014 के चुनाव में मोदी की सुनामी से दलित-मुस्लिम फार्मूला तहस-नहस होने के साथ ही हाथी के पांव उखड़ते गए। पार्टी की घटती ताकत पर एक के बाद एक जनाधार वाले नेताओं की बगावत से भी माहौल बिगड़ता गया। ऐसे में मायावती ने चुनाव से ठीक पहले सपा से हाथ मिलाने का फैसला किया। साढ़े पांच माह बाद अचानक मायावती ने गठबंधन तोड़ सपा सहित भाजपा विरोधी उन नेताओं को भी बड़ा झटका दिया, जिन्हें गठबंधन के दम पर विधानसभा चुनाव जीतने की बड़ी उम्मीदें थीं। पिछले चुनावों के नतीजों से साफ है कि भाजपा पहले ही बसपा के खासतौर से दलित और सपा के पिछड़े वोट बैंक में सेंध लगा चुकी है। अब मुस्लिम समाज के भी बसपा से छिटककर सपा में ही जाने की उम्मीद है। पार्टी के खिसकते जनाधार से विधानसभा चुनाव करीब आने तक बसपा के कई और विधायक, पदाधिकारी व वरिष्ठ नेता भी मायावती का साथ छोड़ सकते हैं।