September 21, 2020

राज्य को एससी-एसटी श्रेणी में वर्गीकरण करने का अधिकार

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा
  • अब बड़ी पीठ को जाएगा मामला

नई दिल्ली, 28 अगस्त (एजेंसी)। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अहम फैसला देते हुए कहा है कि राज्य आरक्षण के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय में भी कैटेगरी बना सकते हैं। कोर्ट ने ये फैसला इसलिए लिया है ताकि एससी-एसटी में आने वाली कुछ जातियों को बाकी के मुकाबले आरक्षण के लिए प्राथमिकता दी जा सके। इससे पहले 2004 में ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला दिया था कि किसी वर्ग को प्राप्त कोटे के भीतर कोटे की अनुमति नहीं है। पांच जजों की दो पीठों में मतभिन्नता के कारण अब यह मामला बड़ी पीठ (सात जजों की बेंच) को भेजा जाएगा। जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि 2004 के फैसले को फिर से पुर्नविचार की जरूरत है। पीठ ने कहा कि अगर राज्य सरकार के पास आरक्षण देने की शक्ति होती है, वह उप-वर्गीकरण बनाने की भी शक्ति रखती है। इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उचित निर्देश के लिए रखा जाना चाहिए। इंदिरा बनर्जी,विनीत शरण,एम. आर.शाह और अनिरुद्ध बोस वाली पीठ ने कहा कि 2004 के फैसले को सही ढंग से तय नहीं किया गया था और राज्य एससीध्एसटी के भीतर जाति को उपवर्गीकृत करने के लिए कानून बना सकते हैं।

बड़ी पीठ की स्थापना के लिए जोर
पीठ ने पंजाब सरकार द्वारा सीजेआइ जस्टिस एसए बोबडे के समक्ष हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर मामले को लेकर पहले के निर्णय को फिर से पुनर्विचार करने के लिए एक बड़ी पीठ की स्थापना के लिए जोर दिया। दरअसलए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को एससीध्एसटी को उपवर्गीकृत करने के लिए सशक्त बनाने वाला एक कानून खत्म कर दिया था। हाईकोर्ट ने शीर्ष अदालत के 2004 के फैसले पर भरोसा किया था और यह माना था कि पंजाब सरकार को एससीध्एसटी को उपवर्गीकृत करने की कवायद करने का अधिकार नहीं था।