Fri. Aug 7th, 2020

रोचक हुई ‘जंग’, आज नजरें हाईकोर्ट पर, आएगा फैसला

  • स्पीकर की दलील- याचिका प्रीमेच्योर, अदालत लिमिटेड ग्राउंड पर ही दे सकती है दखल

सोमवार का दिन राजस्थान की सियासत में सचिन पायलट बनाम अशोक गहलोत के बीच सत्ता की जंग का अहम दिन है। राजस्थान हाई कोर्ट को पायलट की याचिका पर फैसला लेना है जिसमें उन्होंने उनके गुट के विधायकों को अयोग्य घोषित करने के नोटिस के खिलाफ दायर किया था।

सांध्य ज्योति संवाददाता
जयपुर, 20 जुलाई। राजस्थान में चल रहे सियासी संकट के बीच आज का दिन काफी अहम है। सचिन पायलटऔर उनके गुट के बागी विधायकों को विधानसभा स्पीकर की ओर से व्हिप उल्लंघन के मामले में दिए गए नोटिस पर हाईकोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। मुख्य न्यायाधीश इंद्रजीत माहन्ती और जस्टिस प्रकाश गुप्ता की बेंच इस पर सुनवाई कर रही है। राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि यह याचिका अभी प्रीमेच्योर है। इस बाबत फाइनल निर्णय नहीं लिया गया है। अंतिम निर्णय आने के बाद भी अदालत लिमिटेड ग्राउंड पर ही दखल दे सकती है। सिंघवी ने दलील दी कि याचिका में उस ग्राउंड का उल्लेख नहीं है, जिसके आधार पर स्पीकर के आदेश को चुनौती दी जा सकती है।
इस मामले में पायलट गुट की ओर से बहस हो चुकी है। स्पीकर की तरफ से आज हो रही बहस शुक्रवार को अधूरी रह गई थी। वहीं, पब्लिक अगेंस्ट करप्शन ने भी इस मामले में शामिल होने के लिए मामले की सुनवाई कर रही पीठ के समक्ष प्रार्थनापत्र पेश किया था। हालांकि, उन्हें कोर्ट में अंदर नहीं जाने दिया गया। इसको लेकर अधिवक्ता पूनमचंद भंडारी ने राजस्थान हाईकोर्ट के कोर्ट नंबर 1 के बाहर विरोध किया। हाईकोर्ट में बागी विधायकों के नोटिस मामले को लेकर सुनवाई सोमवार को आधे घंटे पहले शुरू हुई। अदालत ने सुबह 10 बजे से इस मामले की सुनवाई शुरू की। सामान्यत: अदालत में सुनवाई 10.30 बजे से शुरू होती है, लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट से आग्रह किया था कि उन्हें 12 बजे अन्य जरूरी काम हैं। ऐसे में सुनवाई थोड़ी जल्दी शुरू की जाए।

स्पीकर के बाद मुख्य सचेतक की ओर से होगी बहस
इस केस में स्पीकर के बाद सरकार के मुख्य सचेतक महेश जोशी की ओर से बहस होगी। उनकी तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता एके भंडारी और एनके मालू पैरवी करेंगे। बागी विधायकों की ओर से नोटिस को लेकर लगाई गई इस याचिका के जवाब में महेश जोशी की ओर से कहा गया था कि हाईकोर्ट को स्पीकर के काम में दखल देने का अधिकार नहीं है। अनुसूची 10 की संवैधनिकता सुप्रीम कोर्ट पहले ही तय कर चुका है।

सचिन खेमे ने दी थी यह दलील
सचिन खेमे की ओर से खंडपीठ के समक्ष बहस पहले ही पूरी कर ली गई। इस याचिका में सचिन खेमे के अधिवक्ता हरीश साल्वी ने दलील देते हुए कोर्ट को बताया था कि सभी नोटिस धारकों ने अपनी पार्टी के विरुद्ध कोई बयान नहीं दिया और ना ही ऐसा कोई काम किया, जिससे यह साबित किया जा सके कि इन्होंने पार्टी के खिलाफ कोई षड्यंत्र किया हो। किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ की गई टिप्पणी को पार्टी से नहीं जोड़ा जा सकता ऐसा करने से संविधान की धारा 19 (1) (क) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन होता है ऐसे में यह नोटिस नहीं दिया जा सकता।

क्या है कानून?
दल बदल के मामले में जुड़ा यह कानून वर्ष 1985 मैं भारतीय संसद में इसे पारित किया गया। जिसे संविधान के अनुच्छेद 101, 190 व 193 में संशोधन किया गया और संविधान की दसवीं अनुसूची जोड़ी गई इसे दलबदल करने वाले सदस्य और विधायकों की योग्यता निरस्त करने संबंधी प्रावधान किए गए। संविधान के अनुसार विधानसभा के अध्यक्ष सभा नियमों विशेष अधिकार एवं शक्तियों के संरक्षक होते हैं और संसदीय परंपराओं का संरक्षण करना उनका कर्तव्य होता है अध्यक्ष की इन्हीं शक्तियों को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा विशेषकर दल-बदल कानून यानी 10 अनुसूची को लेकर होती है यह उनकी भूमिका न्यायाधीश के समान हो जाती है।

क्या है सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के निर्णय ?
इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट जस्टिस जेएस वर्मा द्वारा वर्ष 1992 में किहोतो होलाहान के निर्णय में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि अपवाद को छोड़कर कोई भी अदालत विधानसभा अध्यक्ष को इस मामले में तब तक कोई आदेश नहीं दे सकती, जब तक वह विधायकों की अयोग्यता को लेकर कोई निर्णय नहीं ले ले। इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि अदालतों को इस तरह के मामलों में अपनी भूमिका सीमित रखनी चाहिए। लेकिन वर्तमान मामले में दसवीं अनुसूची के अंतर्गत 2 (1) (अ) की वैधता को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (अ) में दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंंघन है।

रोचक मोड़ पर पहुंच गया मामला
कानूनी जानकार चन्द्रशेखर व्यास ने बताया कि हालांकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में यह तो स्पष्ट हो गया कि अदालतों को इस तरह के मामलों में अपनी भूमिका सीमित रखनी है। लेकिन वर्तमान मामले में दसवीं अनुसूची के अंतर्गत 2 (1) (अ) की वैधता को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (अ) में दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है। ऐसे में यह मामला एक रोचक स्थिति में पहुंच गया है क्योंकि हाईकोर्ट की खंडपीठ को देखना है कि क्या 1992 के निर्णय तथा उसके बाद के निर्णय में दिए गए तथ्यों और कानूनी पहलुओं को देखते हुए वर्तमान मामले में किसी व्याख्या की आवश्यकता है या नहीं ?