September 21, 2020

वैज्ञानिकों ने एक नए ब्लैक होल का पता लगाया

Illustration of a black hole seen from an orbiting planet. A black hole is a region of spacetime where the gravity is so powerful that not even light can escape them. They are created when massive stars die. This one is surrounded by an accretion disc of material, the light from which is warped by the strong gravity. Both the front of the disc and the portion behind the black hole are visible.

बोले ये अब तक का सबसे पुराना

नई दिल्ली, 9 सितम्बर (एजेंसी)। दूसरी दुनिया की गतिविधियों का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक नित नई चीजों की खोज करते रहते हैं। अब वैज्ञानिकों ने एक नए ब्लैक होल का पता लगाया है। इसे अब तक का सबसे पुराना ब्लैक होल बताया जा रहा है। ब्लैकहोल के बनने की अब तक की कहानी में इस घटना ने एक नई चुनौती पैदा कर दी है। यह इस बात का भी संकेत है कि अब तक कितनी कम जानकारी है। वैज्ञानिकों का कहना कि ब्रह्मांड का एक विशालकाय भाग अब भी हमारे लिए अज्ञात है। हालांकि वैज्ञानिक इस खोज से चकित हैं। नई जानकारी देने वाली दोनों रिसर्च रिपोर्टें फिजिकल रिव्यू लेटर्स और एस्ट्रो फिजिकल जर्नल लेटर्स में छापी गई हैं। रिपोर्ट तैयार करने वाले दो ग्रुपों में एक है लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रैविटेशनल वेव ऑब्जर्वेटरी यानी लिगो। इसमें प्रमुख रूप से एमआईटी और कैलटेक के वैज्ञानिक हैं। दूसरा ग्रुप है विर्गो कोलैबोरेशन जिसमें पूरे यूरोप के 500 वैज्ञानिक हैं।

कहानी में नई चुनौती
जीडब्ल्यू 190521 की खोज 21 मई 2019 को तीन इंटरफेरोमीटरों के जरिए हुई थी। ये उपकरण पृथ्वी से गुजरने वाली गुरुत्वीय तरंगों में किसी परमाणु नाभिक से हजार गुना छोटे आकार के परिवर्तन को भी माप सकती हैं। मौजूदा जानकारी के मुताबिक किसी तारे के गुरुत्वीय विखंडन से सूरज के भार की तुलना में 60.120 गुना वजनी ब्लैक होल का निर्माण नहीं हो सकता। तारों के विखंडन के तुरंत बाद होने वाला सुपरनोवा विस्फोट इनके टुकड़े टुकड़े कर देता है। आमतौर पर माना जाता है कि ब्लैक होल इतने घने होते हैं कि इनके गुरुत्वाकर्षण बल से होकर प्रकाश की किरणें भी नहीं गुजर सकतीं। यदि इस तरह से देखा जाए तो ब्लैकहोल के अस्तित्व पर ही सवाल उठ जाते हैं। दो दूसरे ब्लैकहोल के मिलने से बने इस ब्लैक होल को फिलहाल जीडब्ल्यू 190521 कहा जा रहा है। करीब 1500 वैज्ञानिकों के दो ग्रुपों ने इस बारे में कई रिसर्चों के बाद जानकारी दी है। रिसर्च रिपोर्ट के सहलेखक स्टारवरोस कात्सानेवास यूरोपियन ग्रैविटेशन ऑब्जर्वेटरी में खगोल भौतिकविज्ञानी हैं। उनका कहना है कि इस घटना ने ब्लैक होल के बनने की खगोलीय प्रक्रिया पर से पर्दा उठाया है। यह एक पूरी नई दुनिया है।
इस कथित स्टेलर क्लास ब्लैक होल का निर्माण तब होता है जब कोई बहुत पुराना तारा खत्म हो जाता है और आकार में 3.10 सूरज के बराबर होता है। भारी द्रव्यमान वाले ब्लैक होल ज्यादातर गैलैक्सियों के केंद्र में पाए जाते हैंए इनमें मिल्की वे भी शामिल है। इनका भार करोड़ों से अरबों सौर द्रव्यमान के बराबर होता है। अब तक सूरज की तुलना में 100 से 1000 गुना ज्यादा मास वाले ब्लैक होल नहीं मिले हैं।