October 26, 2020

वैष्णो देवी गुफा मंदिर का एक दिलचस्प रहस्य

माता ने किया था भैरवनाथ का वध

वर्ष 2020 में पितृपक्ष के ठीक बाद से ही पुरुषोत्तम मास यानि अधिक मास लग जाने से इस बार नवरात्रि पर्व करीब एक माह देरी से शुरु होने जा रहा है। इस साल ये पर्व 17 अक्टूबर से शुरु होगा। ऐसे में हम आपको वैष्णो देवी गुफा मंदिर से जुड़ी कुछ खास बातें बताते हैं। जिनमें से कुछ की शायद आपको जानकारी न हो वहीं कुछ ऐसी भी चीजें हैं, जिनकी ओर आपने कभी ध्यान ही नहीं दिया होगा।
दरअसल देवी मां वैष्णो देवी का विश्व प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर जम्मू और कश्मीर के कटरा नगर के समीप की पहाडिय़ों पर स्थित है। इन पहाडिय़ों को त्रिकुटा पहाड़ी कहते हैं। यहीं पर लगभग 5,200 फीट की ऊंचाई पर मातारानी का मंदिर स्थित है। यह भारत में तिरूमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थ स्थल है। दरअसल त्रिकुटा की पहाडिय़ों पर स्थित एक गुफा में माता वैष्णो देवी की स्वयंभू तीन मूर्तियां हैं। इनमें देवी काली (दाएं), मां सरस्वती (बाएं) और मां लक्ष्मी (मध्य) पिण्डी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों पिण्डियों के सम्मिलित रूप को वैष्णो देवी माता कहा जाता है। वहीं इस स्थान को माता का भवन कहा जाता है। पवित्र गुफा की लंबाई 98 फीट है। जबकि भवन वह स्थान है जहां माता ने भैरवनाथ का वध किया था। प्राचीन गुफा के समक्ष भैरो का शरीर मौजूद है और कहा जाता है कि उसका सिर उड़कर तीन किलोमीटर दूर भैरो घाटी में चला गया जबकि शरीर यहीं रह गया। जिस स्थान पर सिर गिरा, आज उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है।

वैष्णो देवी गुफा मंदिर की पौराणिक कथा
यूं तो मंदिर के संबंध में कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं। लेकिन जिस मुख्य कथा के बारें में बताया जाता है उसके अनुसार एक बार त्रिकुटा की पहाड़ी पर एक सुंदर कन्या को देखकर भैरवनाथ उससे पकडऩे के लिए दौड़े। तब वह कन्या वायु रूप में बदलकर त्रिकुटा पर्वत की ओर उड़ चलीं। भैरवनाथ भी उनके पीछे भागे। माना जाता है कि तभी मां की रक्षा के लिए वहां पवनपुत्र हनुमान पहुंच गए। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल में अपने केश धोए। फिर वहीं एक गुफा में प्रवेश कर माता ने नौ माह तक तपस्या की। इस दौरान हनुमानजी ने पहरा दिया। फिर भैरव नाथ भी वहां आ धमके। उस दौरान एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है, इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अद्र्धकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अद्र्धकुमारी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहां माता ने भागते-भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था।

अंत में गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया और भैरवनाथ को वापस जाने के लिए कह कर फिर से गुफा में चली गईं, लेकिन भैरवनाथ नहीं माना और गुफा में प्रवेश करने लगा। यह देखकर माता की गुफा कर पहरा दे रहे हनुमानजी ने उसे युद्ध के लिए ललकार और दोनों का युद्ध हुआ। युद्ध का कोई अंत नहीं देखकर माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का वध कर दिया। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने मां से क्षमादान की भीख मांगी। माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी। तब उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएंगे, जब तक कोई भक्त, मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा।