September 24, 2020

व्रत करने से मिलता है वाजपेय यज्ञ के समान फल जलझूलनी एकादशी

रवट बदलने से उनके स्थान में परिवर्तन हो जाता है इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। कहते हैं परिवर्तिनी एकादशी का व्रत करने से व्रती को वाजपेय यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है।
परिवर्तिनी एकादशी व्रत 29 अगस्त शनिवार को रखा जाएगा। हिन्दू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तनी व जलझूलनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु जी अपने शयन मुद्रा में करवट बदलते हैं। करवट बदलने से उनके स्थान में परिवर्तन हो जाता है इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। कहते हैं परिवर्तिनी एकादशी का व्रत करने से व्रती को वाजपेय यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है। इस एकादशी के दिन विष्णु जी के वामन रूप की पूजा होती है। पद्म पुराण में स्वयं श्रीकृष्ण जी ने कहा है कि परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि भगवान इन चार महीनों में वामन रूप में पाताल में निवास करते हैं।
इसे ही जलझूलनी एकादशी है। कहते है कि कृष्ण जन्म के 11वें दिन माता यशोदा ने उनका जलवा पूजन किया था। इस दिन मंदिरों में इस दिन भगवान कृष्ण को पालकी में बिठाकर शोभायात्रा निकाली जाती है और स्नान कराया जाता है। इसी कारण से इस एकादशी को ‘जलझूलनी एकादशीÓ भी कहा जाता है।

व्रत विधि
सुबह जल्दी उठें। शौचादि से निवृत्त होकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
भगवान विष्णु जी की प्रतिमा को गंगा जल से नहलाएं और दीपक जलाकर उनका स्मरण करते हुए पूजा में उनकी स्तुति करें।
पूजा में तुलसी के पत्तों का भी प्रयोग करें तथा पूजा के अंत में विष्णु आरती करें।
शाम को भी भगवान विष्णु जी के समक्ष दीपक जलाकर उनकी आराधना करें।
विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। द्वादशी के समय शुद्ध होकर व्रत पारण मुहूर्त के समय व्रत खोलें।

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा
पुराणों के अनुसार राजा बलि ने अपने प्रताप के बल पर तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था। एक बार भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा ली। राजा बलि किसी भी ब्राह्राण को कभी भी निराश नहीं करता था। वामन रूप में भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग जमीन देने का वचन मांग लिया। भगवान विष्णु ने दो पग में समस्त लोकों को नाप लिया। जब तीसरे पग के लिए कुछ नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना वचन पूरा करने के लिए अपना सिर वामन ब्राह्राण के पैर के नीचे रख दिया। राजा बलि पाताल लोक में समाने लगे तब राजा बलि ने भगवान विष्णु को भी अपने साथ रहने के लिए आग्रह किया और भगवान विष्णु ने पाताल लोक चलाने का वचन दिया।