September 23, 2020

शिर्डी में मकराना मार्बल से सजी ‘द्वारकामाई’

जयपुर, 16 सितम्बर। लगभग चालीस साल तक सांईबाबा का निवास रही द्वारकामाई (मस्जिद) और चावड़ी मंदिर अब प्रदेश के मकाराना के मार्बल से चमक-दमक रही है। सांई संस्थान ने दानदाताओं के सहयोग से इसे मकराना मार्बल पत्थरों से नया रूप दिया गया। सांईबाबा संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के.एच. बगाटे ने बताया कि सन् 1872 में सांईबाबा का आगमन शिर्डी की एक उजाड़ और जर्जर सी मस्जिद में हुआ था। उस समय कोई वहां भटकता भी नहीं था। जमीन ऊबड़-खाबड़ थी और सफाई का भी अभाव था। सांईबाबा ने जमीन को साफ किया और गोबर से लिपाई-पुताई करने बाद यहां रहना शुरू किया। इस मस्जिद को सांईबाबा ने ही द्वारकामाई का नाम दिया था। सांई के कारण श्रद्धालुओं का आगमन वहां शुरू हुआ। साल 1897 में गोपालराव गुंड ने द्वारकामाई के जीर्णोद्धार करने की मंशा जताई, परंतु सांईबाबा ने इस प्रस्ताव को नकार दिया। इसके चलते जीर्णोद्धार के लिए मंगवाए पत्थरों से गांव के मंदिर को सुधारा गया। सीईओ बगाटे के मुताबिक 20 फरवरी 1912 को सांईबाबा ने द्वारकामाई के जीर्णोद्धार को सहमति प्रदान की। बाबा की अनुमति से चांदोरकर ने उक्त काम की जिम्मेदारी नानासाहब निमोणकर को सौंपी। तब मुंबई से कारीगर बुलवाए गए और फर्शियां बिछाई गई। इसके बाद साल 1935-36 में जहांगीर ने द्वारकामाई का पुन: जीर्णोद्धार किया। इसके बाद साल 1951 और 1996 में सांई संस्थान ने द्वारकामाई की फर्शियां बदली। उसके बाद करीब ढाई दशक के बाद इसे संगमरमरी पत्थरों से सुशोभित किया गया। अंनत चतुर्दशी के पावन अवसर पर द्वारकामाई की नई चमचमाती फ्लोरिंग का पूजन किया गया।

ऐसे हुआ द्वारकामाई व चावड़ी मंदिर का फर्शीकरण
लॉकडाउन में मंदिर बंद होने के दौरान मंदिर प्रमुख रमेश चौधरी ने द्वाराकामाई की खराब स्थिति के चलते फर्श बदलने का सुझाव संस्थान के जनसंपर्क अधिकारी मोहन यादव को दिया था। यादव ने यह बात अमियाता रघुनाथ आहेर से कही। दानदाताओं से मिली रकम की मदद से जीर्णोद्धार पर आहेर ने सहमति जताई। इसके चलते सुझाव उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी रविन्द्र ठाकरे और उनके जरिए सीईओ बगाटे तक पहुंचा। इस बीच यादव ने सांईभक्त के.वी. रमणी और उनके भाई भास्करन ने दान को लेकर चर्चा की। दोनों भाईयों ने सहर्श इसमें अपना योगदान देना स्वीकार किया। इसके बाद राजस्थान के मकराना से संगमरमर पत्थरों की आपूर्ति हुई। वहीं के एक सांईभक्त विवेक चतुर्वेदी ने शिर्डी तक अपने खर्च पर पर जयपुर से कुछ कारीगर भिजवाए। इन कारीगरों ने संगमरमरी फर्श तैयार किया। नासिक से बुलवाए गए कारीगरों ने इसकी पॉलिशिंग की। संगमरमर पत्थरों के लिए के.वी. रमण और उनके भाई भास्करन ने 33 लाख और विवेक चतुर्वेदी ने 7 लाख रुपए का सहयोग प्रदान किया है।