August 14, 2020

सादगी, संवेदनशीलता और नवाचार की त्रिवेणी हैं मिश्र

डॉ. लोकेश चन्द्र शर्मा

राजस्थान में 9 सितम्बर, 2019 को पदभार संभालने के बाद सबसे पहले राज्यपाल कलराज मिश्र ने अमर जवान ज्योति पर शहीदों को नमन कर राज्यपाल के पद के कत्र्तव्यों के निर्वहन की शुरुआत की। राज्यपाल ने बिना लाव लश्कर के प्रथम पूज्य गणेशजी के मन्दिर के दर्शन किए। मिश्र प्रत्येक कार्यक्रम की शुरुआत संविधान की उद्देशिका और कत्र्तव्यों के वाचन कराने से करते हैं। प्रदेश में बाढ आई हो या कोरोना की विपदा, राज्यपाल कलराज मिश्र ने सदैव आगे बढ़कर प्रदेश के लोगों की मदद कर संवदेनशीलता का परिचय दिया है।
कुशल प्रशासक, संगठन कला में निपुण, स्वभाव में शालीन एवं मृदुभाषी कलराज मिश्र का जन्म उत्तर प्रदेश के जनपद गाजीपुर के मलिकपुर गांव में 1 जुलाई,1941 को पं. रामाज्ञा मिश्र की चौथी संतान के रूप में हुआ । उन्होंने सन् 1963 में वाराणसी की काशी विद्यापीठ से एम.ए. (समाजशास्त्र) की शिक्षा ग्रहण की। सात मई, 1963 को श्रीमती सत्यवती मिश्रा के साथ परिणय सूत्र में बंधे। चार दशक से राष्ट्रीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में रहने के बावजूद मिश्र के व्यक्तित्व और परिवार में पूर्वांचल की भाषा-संस्कृति, परंपराओं व शालीनता को आसानी से देखा जा सकता है।
वाराणसी में शिक्षा के दौरान वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए। वे संघ की राष्ट्रवाद की अवधारणा को जीवन में आचरित करते हुए आगे बढ़े और शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात् संघ प्रचारक के रूप में अपने को समर्पित किया। वर्ष 1963 में संघ के प्रचारक बन गए।
प्रचारक के रूप में गोरखपुर से कार्य प्रारंभ किया। ठीक पांच वर्ष प्रचारक के रूप में कार्य करने के बाद 1968 में, उन्हें उत्तर प्रदेश में जनसंघ में संगठन मंत्री के रूप में आजमगढ़ में लगाया गया। उनकी अपार संगठन क्षमता को देखते हुए उन्हें 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति का पूर्वी उत्तर प्रदेश का संयोजक बनाया गया। आपातकाल के दौरान ‘रासुकाÓ में बंदी बनाए गए और 19 महीने तक देवरिया जेल में रहे तथा मोरारजी देसाई के नेतृत्ववाली जनता पार्टी के शासन काल में 2 अप्रैल को राज्यसभा के लिए चुने गए। उसी वर्ष इंदौर में युवा मोर्चा के आयोजित अधिवेशन में मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। बाद में तत्कालीन सत्तारूढ जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने जनता पार्टी के विभिन्न युवा संगठनों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए यूथ को-ऑर्डिनेशन कमेटी का गठन किया और इस कमेटी के संयोजक के रूप में मिश्र को चुना। उनके इस चयन से जनता पार्टी में सभी शीर्ष नेताओं की सहमति थी। आशा के अनुरूप उन्होंने जनता पार्टी के पांच घटकों-जनसंघ, कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी, कांग्रेस (ओ), सोशलिस्ट और लोकदल के युवा संगठनों के बीच समन्वय स्थापित करने में सफलता प्राप्त की।
सन् 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के पश्चात् वे उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के संगठन महामंत्री बनाए गए। उस समय उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता के प्रदेश अध्यक्ष माधव प्रसाद त्रिपाठी थे। 1984 में माधव प्रसाद त्रिपाठी के स्वर्गवासी होने के पश्चात् कल्याण सिंह अध्यक्ष बने, उनके साथ भी प्रदेश महामंत्री के रूप में उत्तराखंड सहित उत्तर प्रदेश (उत्ताखंड का निर्माण नहीं हुआ था) संगठन कार्य को व्यापकता प्रदान की। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभावी तौर पर संगठन को मजबूती प्रदान की। पूरे प्रदेश में कार्यकर्ताओं के घर जा-जाकर उनके सुख-दु:ख में सहभागिता पर पार्टी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार किया। सन् 1991 के चुनाव में उनके कुशल संचालन व सक्षम नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने 212 सीटें जीतकर पहली बार स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया, जिसे उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के इतिहास का स्वर्णिम युग कहा जाता है।
मिश्र चार बार उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे। उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण, पर्यटन, चिकित्सा, शिक्षा जैसे महत्वमपूर्ण विभागों के मंत्री रहे। उनके कुशल मार्गदर्शन के कारण उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग को भारत सरकार की ओर से ‘बेस्ट परफॉर्मिंग स्टेट इन द कंट्रीÓ का पुरस्कार मिला। लोक निर्माण मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल को प्रदेश में आज भी याद किया जाता है। प्रदेश की खस्ता हालत सड़कों को ठीक करने के लिए उन्होंने प्रदेश में गड्ढामुक्त सड़कों का न सिर्फ नारा दिया बल्कि उसे चरितार्थ किया और अपने प्रयास से दीनदयाल उपाध्याय संपर्क योजना के माध्यम से कनेक्टीविटी का सपना साकार किया। उनके कार्यकाल में प्रदेश में राष्ट्रीय राजमार्ग में 4236 कि.मी. की वृद्वि हुई और श्यामाप्रसाद मुखर्जी शहरी सुधार योजना प्रांरभ की गई।
ग्रामीण इलाकों को शहरों से जोडऩे के लिए 500 आबादीवाले गांवों को मुख्य सड़क से जोडऩे के लिए दीनदयाल मार्ग योजना की शुरूआत की गई। यह योजना अटल बिहारी वाजपेयी को इतनी पसंद आई कि जब वे भारत सरकार के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की शुरूआत की। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की मिली-जुली सरकार बनने पर उनके प्रदेश अध्यक्ष पद छोड़कर मंत्री बनने पर लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी ने उल्लेख किया, ‘हम इस सरकार को भाजपा की ओर से गंभीरता प्रदान करने लिए कलराज जी जैसे वरिष्ठ नेता को प्रदेश दायित्व से मुक्त कर इस सरकार में शामिल कर रहे हैं।’
सन् 2001 में राज्यसभा के लिए पुन: निर्वाचित हुए। वर्ष 2002 के चुनावों में पार्टी को अपेक्षित सफलता न मिलने पर नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। पार्टी के कंद्रीय नेतृत्व ने वर्ष 2003 में उत्तर प्रदेश प्रभारी, 2004 में दिल्ली व राजस्थान के प्रभारी के रूप में संगठन की विशेष जिम्मेदारी दी। वर्ष 2006 से वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव तक बिहार प्रदेश प्रभारी का दायित्व निभाया। वर्ष 2006 में तीसरी बार राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। राज्यसभा के कार्यकाल में वे पार्टी के प्रमुख वक्ताओं के रूप में उभरे और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय व स्थानीय मुद्दों को सदन के बाहर प्रखरता से उठाया। 25 मार्च, 2011 को भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए तथा हिमाचल प्रदेश के प्रभारी बनाए गए। उन्होंने राज्यसभा सांसद के रूप में सब-ऑर्डिनेट लेजिसलेशन कमेटी के चेयरमैन के रूप में सराहनीय काम किया। खेलों के प्रति उनकी विशेष रूचि है। ऑल इंडिया ओलंपिक संघ, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष रहे तथा उत्तर प्रदेश स्पोट्र्स प्रमोशन समिति के अध्यक्ष के साथ-साथ तीरंदाजी संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे हैं। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों में लखनऊ (पूर्व) सीट से भारी मतों से विजय प्राप्त की। वर्ष 2014 के आम चुनावों में उन्हें नई सीट देवरिया से पार्टी नेतृत्व द्वारा भेजा गया। उन्होंने पार्टी का फैसला सहर्ष स्वीकार किया। अपनी कर्मठता, लोकप्रियता व अनूठे व्यक्तित्व व अथव परिश्रम के बल पर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को लगभग पौने तीन लाख मतों से पराजित किया और केन्द्र में मंत्री बनाए गए।