September 24, 2020

100 साल बाद कुतुब मीनार की मरम्मत

नई दिल्ली, 12 सितम्बर (एजेंसी)। जिस विश्व धरोहर कुतुबमीनार की भव्यता की देश से लेकर विदेश में चर्चा है, उस मीनार के अंदर की 179 सीढिय़ां बदली जाएंगी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा सुरक्षा को लेकर कराए गए सर्वे में यह बात सामने आई है कि मीनार की 379 सीढिय़ों में से 200 के करीब सीढिय़ां ही अच्छी स्थिति में हैं। अन्य को बदले जाने की जरूरत है। इतने बड़े स्तर पर करीब सौ साल बाद मीनार में काम होने जा रहा है। यह काम मीनार को मजबूती प्रदान करने के लिए होगा। एएसआई का मीनार में पर्यटकों के प्रवेश देने का कोई इरादा नहीं है। एएसआई के सूत्रों के अनुसार सीढिय़ों पर पत्थर अलग अलग रंग के हैं। कुछ सीढिय़ों में लाल पत्थर है कुछ में हल्का काला पत्थर है। एएसआई के नियम के तहत जो पत्थर जिस रंग और जिस गुणवत्ता वाला है, उसी गुणवत्ता वाला उस रंग का पत्थर लगाया जाएगा। इसके लिए सीढिय़ों के पत्थरों का सर्वे कराया जा रहा है। माना जा रहा है कि अगले तीन माह में सीढिय़ों के पत्थर बदलने का काम शुरू कर दिया जाएगा।
छह माह के अंदर पूरा किया जाएगा काम
काम शुरू करने के छह माह के अंदर इस कार्य को पूरा किया जाएगा। क्योंकि इस कार्य में अधिक समय लगने की संभावना है। सभी सीढिय़ां दोनो ओर मीनार की दीवार में अंदर तक घुसी हुई हैं। सुरक्षा के लिहाज से मीनार की दीवारों से छेड़छाड़ नहीं की जा सकजी है। इसलिए इस कार्य को इस तरह से किया जाएगा कि सीढिय़ां भी बदल जाएं और मीनार की सुरक्षा भी बरकरार रहे। कुतुबमीनार एएसआई के उन स्मारकों में शामिल है जिनमें साल भर पर्यटकों की भीड़ रहती है। 2018 में मीनार के खराब हो चुके पत्थर और मीनार के अंदर सीढिय़ों के साथ हर मंजिल पर बने रोशनदान बदले गए थे।

कुतुब परिसर को बेहतर किया गया है। परिसर से खुरदुरे पत्थरों को हटाया गया है ताकि पर्यटक आसानी से चल फिर सकें। प्रवेश द्वार और बाहर निकलने वाले द्वार को बेहतर किया गया है। स्मारक में प्रवेश और बाहर जाने के लिए अलग अलग रास्ते बनाए गए हैं। कुतुब परिसर को और दिव्यांग फ्रेंडली किया जाएगा। दिव्यांगों के रास्ते और बेहतर किए जाएंगे।

सीमेंट नहीं,चूना, गुड़, उड़द, बेल पत्र के फल का होगा उपयोग
सीढिय़ों को लगाने के लिए सीमेंट का इस्तेमाल नहीं होगा। बल्कि चूना, गुड़,उड़द,बेल पत्र के फल,गोंद,सुर्खी जैसी चीजें इस्तेमाल में लाई जाएंगी। इसका गारा बनाकर तैयार किया जाएगा। यह ऐसी पद्धति है जिसे बनी इमारतें सैकड़ों सालों तक खराब नहीं होती हैं। स्मारकों के निर्माण में इसी पद्धति का इस्तेमाल किया गया है। इस कार्य के अलावा मीराना के अंदर रोशनी की भी व्यवस्था की जाएगी।

दुर्घटना के बाद 40 साल से बंद है मीनार में प्रवेश
स्मारकों को बचाने के लिए काम कर रही संस्था विरासत के अध्यक्ष व अधिवक्ता लखेंद्र सिंह कहते हैं कि 1980 में मीनार में भगदड़ में कुछ स्कूली बच्चों के मारे जाने के बाद इसके अंदर प्रवेश बंद कर दिया गया था। उस समय भी कई बार पर्यटक मीनार में ऊपर जाकर डर जाते थे। इसे देखते हुए मीनार के प्रवेश द्वार पर चेतावनी लिखी गई थी। गेट पर लिखा हुआ मिलता है कि मीनार में एक साथ कम से कम तीन लोग जरूर जाएं। लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से इस मीनार का निर्माण किया गया है।