Tue. Jun 18th, 2019

जानें कैसा हो आपके नवजात शिशु का आहार

नवजात शिशु की सिर्फ 3 मांगें होती हैं। पहली, वह अपनी मां के बाजुओं की गरमाहट चाहता है, तो दूसरी, वह स्तनपान का अपना आहार चाहता है और तीसरी, वह मां की उपस्थिति में अपनी सुरक्षा चाहता है। उस की ये तीनों ही मांगें स्तनपान से पूरी हो जाती हैं। बच्चे के जन्म के पहले ही दिन से बच्चा और मां एक अटूट बंधन में बंध जाते हैं, जो स्तनपान द्वारा और मजबूत होता जाता है। लेकिन पहले बच्चे के जन्म के समय मां को उस की देखभाल और आहार के बारे में ज्यादा पता नहीं होता, इसलिए कई बार वह गलतियां कर बैठती है। नवजात शिशु का आहार कैसा हो इस के बारे में बता रहे हैं एशियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैडिकल साइंस के सीनियर कंसल्टैंट जसप्रकाश सेन मजूमदार।

शुरुआती आहार
शिशु जब जन्म लेता है तो वह सिर्फ मां के दूध पर ही निर्भर रहता है। उसे पानी देने की भी जरूरत नहीं पड़ती। मां का दूध शिशु के लिए शुद्ध, मिलावट रहित और पोषक तत्त्वों से भरपूर होता है। इस का सही मात्रा में सेवन करवाने से बच्चा स्वस्थ रहता है और मां व शिशु में इस से भावनात्मक रिश्ता बन जाता है। ब्रैस्ट मिल्क में इम्युनोग्लोबुलिन (सुरक्षात्मक प्रोटीन) मिला होता है, जो शिशु को बाहरी संक्रमण से बचाता है।

6 माह का होने तक आहार
नवजात शिशु शुरू में कुछ दिनों तक दिन में लगातार कई बार कुछ अंतराल पर दूध की मांग करता है। उस में पहले हफ्ते में वह दिन में 8 से 15 बार दूध की मांग करता है, तो पहले हफ्ते के बाद 6 से 8 बार। जो शिशु स्तनपान करते हैं वे डब्बाबंद दूध पीने वाले शिशुओं की तुलना में अधिक बार दूध पीने की मांग करते हैं। फिर 6 से 8 सप्ताह के बीच शिशु स्तनपान और सोने के नियम का पालन करने लग जाता है।
जसप्रकाश सेन मजूमदार का कहना है कि शिशु के जन्म से ले कर 6 महीने तक सिर्फ ब्रैस्ट फीडिंग करवानी चाहिए। इस में पहले दिन से 15 से 20 दिन तक हर 2 घंटे पर दोनों ब्रैस्ट से फीडिंग कराएं। इस के अलावा यदि शिशु की मांग और है, तो इस से ज्यादा भी फीडिंग करा सकती हैं। ऐसा करने से उसे पानी की भी जरूरत नहीं पड़ती है।

6 माह का होने पर
6 माह की आयु से शिशु की अच्छी सेहत, बढ़त और विकास के लिए ऊर्जा के अतिरिक्त स्रोत और अन्य आवश्यक तत्त्व जरूरी होते हैं। उस के लिए मां का दूध पर्याप्त नहीं होता। इसलिए जब शिशु 6 माह का हो जाए तब मां के दूध के साथ उसे अर्ध ठोस आहार भी देना शुरू कर देना चाहिए। वह आहार ठोस आहार इसलिए नहीं होना चाहिए, क्योंकि ठोस आहार वक्त से पहले खिलाने से मोटापा, मधुमेह, उदर रोग, ऐलर्जी तथा अन्य विकृतियों का जोखिम बढ़ जाता है। इसी तरह अगर 6 महीने के बाद आहार देने में देरी की जाए तो बच्चे की सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है।

6 महीने से 24 महीने का होने तक
यह समय किसी भी बच्चे के लिए अति संवेदनशील समय होता है, क्योंकि बच्चे के शरीर का सब से तीव्र विकास इसी समय होता है। बच्चे के शारीरिक वजन के आधार पर पोषण की जरूरत इस समय उच्चतम स्तर पर होती है। यही वह समय होता है जब कई बच्चों में कुपोषण की शुरुआत होने लगती है। बच्चे की पाचन प्रणाली 6 महीने की उम्र में ही इस काबिल हो जाती है कि वह अर्ध ठोस आहार को पचा पाए, क्योंकि 4 से 6 माह के दौरान उस का पेट और गुरदे परिपक्व हो जाते हैं। इस से मां के दूध के अलावा अन्य आहार को पचाने में उसे दिक्कत नहीं होती।

क्या दें आहार 6 महीने के शिशु को

  • 6 महीने के शिशु को मां के दूध के साथ फू्रट जूस दें, जिस में संतरा, मौसमी, कीनू व सेब का जूस हो। ध्यान रखें कि जूस घर पर ही निकाल कर दें। वह बाजार का न हो।
  • केले को मैश कर के दही या दूध के साथ दें।
  • कस्टर्ड बना कर खिलाएं।
  • चावल, सूजी की खीर व दलिया को दूध में पका कर खिलाएं।
  • लौकी, गाजर, आलू जो उसे पसंद आए, उस का सूप बना कर दें। इन सब्जियों को मूंग की दाल की खिचड़ी में भी मिला कर दे सकती हैं।
  • चावल के साथ मूंग की दाल मिला कर प्लेन खिचड़ी दें।
  • ग्लूकोज बिस्कुट और दूध, दही दें।
  • इडली, सांभर दें।
  • इन सब ठोस आहार के साथ पानी हमेशा उबाल कर ठंडा कर के ही दें और कम से कम डेढ़, 2 साल तक बच्चे को ब्रैस्ट फीडिंग कराएं।

आहार कैसे दें
पहली बार शिशु को कोई भी आहार कम मात्रा में ही देना चाहिए ताकि वह उस के स्वाद से परिचित हो सके। फिर धीरेधीरे उस की मात्रा बढ़ाती जाएं। वैसे कोई भी नया भोजन देने से वह बच्चे को शुरुआत में अपच हो सकता है, इसलिए कोई भी एक खाद्यपदार्थ नियमित न दें। उसे बदलबदल कर दें और उस का असर देखें कि कहीं उसे उस से ऐलर्जी तो नहीं हो रही है। यह भी समों कि किसी भी फूड से अगर किसी बच्चे को ऐलर्जी हो रही है, तो यह जरूरी नहीं कि वह दूसरे बच्चे को भी नुकसान पहुंचाएगा।

क्यों होती है ऐलर्जी
बच्चे की सेहत की बुनियाद स्वस्थ खानपान पर ही टिकी होती है, लेकिन कई बार किसी खाने की चीज से बच्चे को ऐलर्जी हो जाती है। दरअसल, खानेपीने के जरीए जब बच्चे के शरीर में कोई बाहरी पदार्थ आता है तो उस का इम्यून सिस्टम शरीर की अन्य बीमारियों से लडऩे के बजाय उस बाहरी पदार्थ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो कर गंभीर प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगता है। इसी वजह से बच्चे में ऐलर्जी के लक्षण दिखने लगते हैं। अगर कोई चीज खाने के बाद बच्चे को पेट या सिर में दर्द, जीमिचलाना, खांसी, त्वचा पर चकत्ते, खुजली या दाने निकलने जैसी कोई समस्या हो तो उसे नजरअंदाज न करें।
इन के अलावा बच्चे में ऐलर्जी के कई और लक्षण भी देखने को मिलते हैं।

फिक्स्ड फूड ऐलर्जी
जिस चीज से बच्चे को ऐलर्जी होती है उसे खाते ही उस के होंठों में सूजन और गले में खुजली होने लगती है। ऐसी ऐलर्जी की पहचान और उपचार आसान है।

साइक्लिकल फूड ऐलर्जी
ज्यादातर बच्चों को यही ऐलर्जी होती है, लेकिन इस की पहचान और उपचार बहुत मुश्किल है। इस तरह की ऐलर्जी के लक्षण कभीकभी 3 दिन बाद दिखाई देते हैं, क्योंकि इस की प्रतिक्रिया इम्यून सिस्टम पर निर्भर करती है। आमतौर पर इस के लक्षण अलगअलग तरह से प्रकट होते हैं। अगर किसी बच्चे को दूध से ऐलर्जी है तो ऐसा भी हो सकता है कि उसे पनीर, दही या आइसक्रीम से भी ऐलर्जी हो। कुछ बच्चों को गेहूं, अंडा, मछली, लीची, अंगूर और अजीनोमोटो से भी ऐलर्जी होती है। इस ऐलर्जी के लक्षण अलगअलग होते हैं। कुछ बच्चों में उम्र बढऩे के साथ ये लक्षण खत्म हो जाते हैं और कुछ में हमेशा बने रहते हैं।

ऐलर्जी से बचाव

  • बच्चे की एक फूड डायरी बनाएं जिस में रोज सुबह से रात तक उसे खाने को कब क्या दिया गया और वह खाना किनकिन चीजों से मिल कर बना था, उस का पूरा विवरण दर्ज करें। इस से उपचार में मदद मिलेगी।
  • रोज यह देखें कि कौन सी चीज खाने के बाद बच्चे में ऐलर्जी के लक्षण दिखते हैं। उस खास चीज के आगे स्टार का निशान लगा दें और बच्चे को कम से कम 4 दिनों तक उस खास चीज से दूर रखें।
  • 5वें दिन बच्चे को वही चीज फिर से खाने को दें जिसे बंद किया था। उस खाने के बाद की प्रतिक्रिया का बारीकी से निरीक्षण करें। अगर वही चीज दोबारा शुरू करने से बच्चे में ऐलर्जी के लक्षण दिखें तो समों उसे साइक्लिकल ऐलर्जी है। उसे तुरंत डाक्टर के पास ले जाएं।
  • ऐलर्जी से बचाने के लिए खानेपीने की चीजों के पैकेट पर लिखा विवरण ध्यान से पढ़ लें ताकि पहले से ही यह मालूम रहे कि जो बच्चे को खिलाने जा रही हैं उस में कोई ऐसा तत्त्व नहीं है जिस से उसे ऐलर्जी हो।
  • जिस चीज से बच्चे को बारबार ऐलर्जी होती हो, उसे उस चीज से दूर रखें।
  • बच्चे में ऐलर्जी का कोई भी लक्षण दिखाई दे तो पहले उस का टैस्ट कराएं और किसी अच्छे डाक्टर से इलाज कराएं, क्योंकि थोड़ी सी सावधानी से ऐलर्जी की समस्या से निबटा जा सकता है।
  • इन सब बातों का कोई भी मां ध्यान रखेगी तो आसानी से अपने बच्चे को ऐलर्जी से बचा पाएगी।

ध्यान देने वाली बातें

  • 6 माह के बाद बच्चे के दांत निकलने शुरू हो जाते हैं। इस समय उस के दांतों में इरिटेशन होता है। उस इरिटेशन को शांत करने के लिए वह किसी भी चीज को मुंह में डाल लेता है और अपने मुंह में रखे रहता है। इस से दस्त होने की संभावना होती है। इस आदत को कम करने के लिए बच्चे को बिस्कुट या टोस्ट दें जिसे वह चूसता रहे।
  • बच्चे का खाद्यपदार्थ पूरी तरह से पका हो।
  • खाद्यपदार्थ मिर्चमसाले वाला व वसायुक्त न दें। वही दें जो वह पचा पाए।
  • कैफीन युक्त पदार्थ न दें। इस से नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
  • बहुत से बच्चों में अंगूठा चूसने की आदत होती है और यह आदत छुड़ाई न जाए तो उस के बड़े होने तक बनी रहती है। इस के लिए डाक्टर से सलाह ले कर अपने बच्चे के अंगूठे में दवा लगा दें, जिस से अंगूठा चूसने की उस की आदत छूट जाएगी। इस के अलावा घर पर ही आप उस के हाथों में कौटन के ग्लब्स पहना दें या अंगूठे पर नीम की पत्ती का लेप लगा दें। एक बार इस का टेस्ट लेने के बाद वह दोबारा मुंह में उंगली नहीं डालेगा।