November 25, 2020

अर्जुन ने किया श्रीराम का अपमान तो हनुमान जी ने ऐसे तोड़ा उनका घमंड

पौराणिक मान्यता है कि पवनपुत्र हनुमान अजर-अमर हैं। वे लंका युद्ध के समय अपने प्रभु श्रीराम की सेवा के लिए त्रेतायुग में उपस्थित थे। श्रीराम ने जब जल समाधि ली, तो हनुमान जी को यहीं पृथ्वी पर रुकने का आदेश दिया। इससे जुड़ा एक प्रसंग आनंद रामायण में मिलता है, जिसमें हनुमान जी अर्जुन के घमंड को तोड़ते हैं। एक बार रामेश्वरम में अर्जुन की मुलाकात हनुमान जी से होती है। दोनों लोगों में लंका युद्ध को लेकर चर्चा होने लगी। अर्जुन को उस समय स्वयं पर संसार का सबसे बड़ा धनुर्धर होने का अभिमान था। बातचीत में उन्होंने हनुमान जी से कहा कि आपके प्रभु राम तो बड़े वीर योद्धा और धनुर्धर थे, तो उन्होंने लंका जाने के लिए बाणों से ही सेतु निर्माण क्यों नहीं कर दिया। इस पर हनुमान जी ने कहा कि बाणों का पुल वानर सेना के भार को सहन नहीं कर पाता। तब अर्जुन ने घमंड से कहा कि वे तो बाणों की ऐसा पुल बना देते, जो टूटमा ही नहीं।
अर्जुन ने हनुमान जी से कहा कि सामने तालाब में वह बाणों का पुल तैयार करके दिखाते हैं, वह आपका भार सहन कर लेगा। उस समय हनुमान जी अपने सामान्य रुप में थे। अभिमान से चूर अर्जुन ने अपने बाणों से तालाब पर एक सेतु बना दिया और हनुमान जी को चुनौती दी। अर्जुन के बनाए सेतु को देखकर हनुमान जी ने कहा कि यदि यह सेतु उनका वजन सहन कर लेगा, तो वे अग्नि में प्रवेश कर जाएंगे और यह टूट जाता है तो तुमको अग्नि में प्रवेश करना होगा। अर्जुन ने शर्त स्वीकार कर ली। हनुमान जी ने विशाल रुप धारण किया और जैसे ही पहला पग उस सेतु पर रखा। वह सेतु डगमगाने लगा। दूसरा पैर रखते हुए सेतु चरमराने लगा। उस पुल की हालात देखकर अर्जुन का सिर घमंड से नीचे हो गया। हनुमान जी ने जैसे ही तीसरा पग रखा, तो वह तालाब खून से लाल हो गया। यह देखकर हनुमान जी सेतु से नीचे आ गए और अर्जुन को अग्नि प्रज्वलित करने को कहा। अग्नि प्रज्वलित होते ही हनुमान जी उसमें प्रवेश करने वाले थे, तभी भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए और बजरंगबली को ऐसा करने से रोका। उन्होंने कहा कि हे भक्त श्रेष्ठ! आपके पहले ही पग के रखते यह सेतु टूट गया होता, अगर मैं कछुआ बनकर अपनी पीठ पर आपका भार सहन नहीं करता।

तीसरा पग रखते ही मेरी पीठ से खून निकलने लगा। यह सुनकर हनुमान जी दुखी हो गए और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। उन्होंने कहा कि वे अपराधी हैं, उनके कारण उनके प्रभु को दुख पहुंचा है। इस श्रीकृष्ण बोले कि यह सब उनकी ही इच्छा से हुआ है। उन्होंने हनुमान जी से कहा कि आप महाभारत युद्ध में अर्जुन की रथ पर लगी ध्वजा पर विराजमान रहें। जब महाभारत का युद्ध हुआ तो अर्जुन की रथ पर हनुमान जी शिखर पर लगे ध्वज पर विराजमान हो गए।