Wed. Jan 16th, 2019

घूस लेकर पशु तस्करों की मदद

सीवीसी रिपोर्ट ने कर दी आलोक वर्मा की छुट्टी!

नई दिल्ली, 11 जनवरी (एजेंसी)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली हाई पावर कमेटी ने सीबीआई चीफ आलोक वर्मा को हटा दिया है। रिश्वतखोरी और ड्यूटी में लापरवाही के आरोपों के आधार पर कमेटी ने ये फैसला लिया। सीबीआई के 55 साल के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, जब किसी चीफ को इस तरह से हटाया गया हो। आलोक वर्मा का कार्यकाल 31 जनवरी को खत्म हो रहा था। 1979 की बैच के आईपीएस अफसर वर्मा सीबीआई से हटाए जाने के बाद अब सिविल डिफेंस, फायर सर्विसेस और होम गार्ड डिपार्टमेंट के जनरल डायरेक्टर बनाए गए हैं वहीं, नागेश्वर राव दोबारा सीबीआई चीफ बन गए हैं।
आलोक वर्मा पर रिश्वतखोरी से लेकर पशु तस्करों की मदद करने के आरोप हैं। केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) इन आरोपों की जांच कर रही था। इसी को आधार बनाकर पीएम मोदी की अध्यक्षता में हाई पावर कमेटी ने 2:1 के अनुपात के फैसले से वर्मा को हटाने का फैसला लिया। मोदी और कमेटी के दूसरे सदस्य सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके सीकरी वर्मा को हटाए जाने के पक्ष में थे वहीं, समिति के तीसरे सदस्य और लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े सीबीआई चीफ को हटाए जाने के खिलाफ थे। खडग़े ने कमेटी को अपना विरोध पत्र (प्रोटेस्ट लेटर) भी सौंपा। मीडिया के पास 6 पन्ने की वो रिपोर्ट है, जिससे पता चलता है कि सीवीसी आलोक वर्मा के खिलाफ 10 बड़े आरोपों की जांच कर रही थी। इनमें से चार आरोपों के पर्याप्त सबूत भी मिले थ। सीबीआई चीफ रहते हुए आलोक वर्मा ने कैसे आईआरसीटीसी केस में पशु तस्करों का बचाव किया था, सीवीसी को उसके सबूत भी मिले हैं। इसके अलावा सीवीसी ने पूर्व सीबीआई चीफ आलोक वर्मा पर लखनऊ में पोस्टिंग के दौरान लगे 5 अन्य आरोपों की जांच भी की थी। वर्मा पर ये आरोप केंद्रीय जांच एजेंसी में नंबर 2 रहे राकेश अस्थाना ने लगाए थे।

मीट कारोबारी मोइन कुरैशी से रिश्वत ली
सीवीसी को यह भी सबूत मिले कि मोइन कुरैशी के खिलाफ जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई थी। उन पर कुरैशी के करीबी सतीश बाबू सना के जरिये दो करोड़ रुपये की रिश्वत लिए जाने के भी सबूत थे। दावा किया गया कि सीबीआई टीम इस केस में हैदराबाद के कारोबारी सतीश बाबू सना को आरोपी बनाना चाहती थी, लेकिन वर्मा ने मंजूरी नहीं दी। इस पूरे मामले में वर्मा की भूमिका संदेहास्पद थी। पहली नजर में उनके खिलाफ मामला बन रहा था। सीवीसी को ये सबूत मिले हैं कि आलोक वर्मा ने सीबीआई चीफ रहते हुए आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव से जुड़े आईआरसीटीसी केस को प्रभावित करने की कोशिश की थी। इसमें वर्मा ने एक अफसर को बचाने के लिए एफआईआर में जानबूझकर उसका नाम शामिल नहीं किया।

सीबीआई के ज्वॉइंट डायरेक्टर राजीव सिंह के भाई संजय सिंह ने किसी काम के लिए इलाहाबाद बैंक से लोन लिया था। राजीव सिंह इसके गारंटर थे। लोन लेने के लिए राजीव सिंह ने बैंक को फर्जी डॉक्यूमेंट दिए थे लेकिन, इसकी जानकारी होते हुए भी आलोक वर्मा ने बतौर सीबीआई चीफ कोई एक्शन नहीं लिया।
ये ड्यूटी में उनकी लापरवाही को दर्शाता है। आलोक वर्मा ने एक केस को रांची के आर्थिक अपराधा शाखा को ट्रांसफर कर दिया वहीं, राजीव सिंह को वो ओहदा दे दिया गया, जिससे वह इस केस के डेवलपमेंट्स पर नजर बनाए रख सके।