Fri. Apr 10th, 2020

इम्यून लोग इस तरह हरा देते हैं कोरोना को

कोरोना वायरस से डरने की नहीं बल्कि इसका डटकर मुकाबला करने की जरूरत है। आपको जानकर हैरानी होगी कि हम यानी मानव प्रजाति कोरोना से अधिक घातक बीमारियों से लड़कर जीत चुके हैं। जैसे, सार्स और इबोला। भले ही इनका एक निश्चित और पर्मानेंट इलाज विकसित नहीं हुआ हो लेकिन अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति और सतर्कता के बल पर हम इन्हें रोकने के कामयाब रहे। अब हमें कोरोना को हराना है…

कोरोना का पूरा नाम
कोरोना वायरस का असली और पूरा नाम सार्स-कोरोना वायरस-2 (SARS- Corona Virus-w) है। जबकि कोविड-19 बीमारी का नाम है इसलिए कंफ्यूज ना हों। सार्स भी एक ऐसा ही संक्रमण था, जो सांस के जरिए तेजी से फैलता था। इसका पूरा नाम सीवियर एक्यूट रेसपिरेट्री सिंड्रोम (Severe Acute Respiratory Syndrome) है।

सार्स इसलिए रहा घातक
सार्स के फैलने की दर सार्स-कोरोना वायरस-2 से अधिक थी और यह इससे कहीं ज्यादा घातक था। इसका फैटेलिटी रेट 10 प्रतिशत था। यानी जितने लोगों को सार्स नामक बीमारी हुई, उसके 10 प्रतिशत लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। जबकि सार्स-कोरोना वायरस-2 के केस में यह मात्रा 3.4 प्रतिशत है।

सार्स और कोरोना का रिश्ता
कुछ सायंटिस्ट्स का कहना है कि सार्स-कोरोना वायरस-2 का जीनोम (Genome) करीब 82 प्रतिशत तक SARS से मैच करता है। यानी सार्स-कोरोना वायरस-2 पहले फैल चुके सार्स वायरस से 80 प्रतिशत से अधिक मेल खाता है। आप अपनी सुगमता के लिए जीनोम को डीएनए की तरह समझ सकते हैं।
तेजी से फैला था सार्स भी

सार्स-कोरोना वायरस-2 का R0 (इसे R-naught पढ़ा जाता है) 2.2 है। यानी इस वायरस से ग्रसित एक व्यक्ति दो से अधिक लोगों को इंफेक्शन दे सकता है। जबकि सार्स जब फैला था, उस समय एक व्यक्ति करीब 3 लोगों को इंफेक्शन दे रहा था।

मुकाबला संभव
कोरोना वायरस पहले से अस्तित्व में है और हमें जब भी कोल्ड होता है तो इसमें राइनो (Rhino) और कोरोना जैसे कई वायरसेज़ का रोल होता है। लेकिन सार्स-कोरोना वायरस-2 चमगादड़ों में पाया जाता है, जो किसी तरह इंसानों में आ गया। यह वायरस कोल्ड देनेवाले दूसरे वायरसों से कुछ मामलों में अलग है। जैसे, यह गले तक सीमित ना रहकर शरीर में अंदर प्रवेश कर जाता है।

इसलिए डरा रहा है कोरोना
कोल्ड वायरस अपर रेस्पेरेट्री ट्रैक्ट (Upper Respiratory Tract) तक ही सिमटे रहते हैं। लेकिन सार्स-कोरोना वायरस-2 हमारे शरीर के लोअर रेस्पेरेट्री ट्रैक्ट में चला जाता है और वहां जाकर तेजी से रेप्लिकेट करता है। यानी अपनी काबर्न कॉपीज बहुत तेजी से बनाता है। इससे हमारे फेफड़ों पर बुरा असर पड़ता है और हमें सांस लेने में दिक्कत होने लगती है।

इम्यून होने का फायदा
जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होती है उनमें सार्स-कोरोना वायरस-2 अपर रेस्पेरेट्री ट्रैक्ट यानी गले और नाक की नर्व्स से नीचे नहीं जा पाता। मतलब गले तक ही सीमित रह जाता है। इससे इन लोगों के फेफड़ों पर यह वायरस अटैक नहीं कर पाता। इस दौरान इनके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पूरी ताकत के साथ इस वायरस को किल करने के लिए ऐंटिबॉडीज बनाने लगती है और ये लोग इस वायरस से लड़ाई जीत जाते हैं।