October 31, 2020

जो लोग करते हैं स्वार्थ और पक्षपात

एक बार पढ़ें यह पौराणिक कथा

मनुष्य के अंदर दया, उपकार, स्नेह, प्रेम जैसे अच्छे गुणों के साथ ही कुछ दुर्गुण भी होते हैं। मनुष्य में स्वार्थ, पक्षपात, कपट जैसे दुर्गुण भी होते हैं। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि जो जैसा करता है, वैसा ही फल भोगता है। कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है। आप दूसरों के साथ गलत व्यवहार करते हैं, तो आपको दूसरे जन्म में उसका फल भोगना पड़ सकता है। आज हम आपको कर्म फल से संबंधित ही एक कथा बताने जा रहे हैं, जिससे पढ़कर आप अपने अंदर सद्गुणों का विकास करेंगे, अच्छे कर्म के लिए प्रेरित होंगे।
एक समय की बात है। देवर्षि नारद विष्णु लोक जा रहे थे। रास्ते में उनको दो तालाब मिले। दोनों ही तालाब का जल मीठा और स्वच्छ ?था, लेकिन कोई भी उनके जल को ग्रहण नहीं करता था। कुछ दूर आगे चलने पर उनको आम के दो फलदार वृक्ष मिले। उस पर मीठे फल लगे थे, लेकिन दुख इस बात का था कि कोई उनको छूता तक नहीं था। नारद जी बड़े सोच में पड़ गए। अपने मार्ग पर आगे जा रहे थे, तभी रास्ते में दो गाय दिखीं। उन दोनों ने नारद जी को बताया के वे दोनों भी दुखी हैं क्योंकि उनका दूध तो बछड़ा भी नहीं पीता है।
यह सभी बातें सोचते हुए नारद जी भगवान विष्णु के पास पहुंचे और तालाब, पेड़ तथा गायों के दुख को बताया। इस पर श्रीहरि ने कहा कि यह तो उनके ही कर्मों का फल है। फिर भगवान विष्णु ने उन तीनों के पूर्वजन्म की बातें बताई। उन्होंने कहा कि वे दोनों तालाब अपने पूर्वजन्म में दो बहनें थीं। दोनों के पास धन की कमी नहीं थी, दोनों ही दान करती थीं, लेकिन पक्षपाती थीं। केवल अपने परिचितों को दान देती थीं। नारद जी ने उनके उद्धार का उपाय पूछा तो भगवान बोले- जब उनके जल से खेतों को सींचा जाएगा और लोगों का कल्याण होगा।
फिर उन्होंने बताया कि आम के दोनों वृक्ष पूर्वजन्म में बहुत बड़े ज्ञानी तथा विद्वान थे। उनका दुर्गुण ये था कि वे स्वार्थी थे, अपना ज्ञान किसी को नहीं देते थे। उनके ज्ञान से मानव समाज को लाभ नहीं मिला। विष्णु जी ने कहा कि उन दोनों वृक्ष का उद्धार तभी होगा जब उनके फलों के बीज से बाग लगाए जाएंगे। उसके फल दूसरों को खाने को मिलें।
ऐसे ही उन्होंने उन दो गायों के बारे में भी बताया। वे दोनों गाएं पूर्वजन्म में महिला थीं। वे केवल अपने पति तथा बच्चे का ही ध्यान रखती थीं। वे दोनों संकीर्ण सोच की थीं। उनमें छल-कपट था। उन दोनों गायों का दूध जब निर्बल, रोगी और गरीब बालकों को पीने के लिए मिलेगा, तो उनका भी उद्धार हो जाएगा।
ये बातें सुनने के बाद नारद जी उन तीनों के पास बारी-बारी से गए और उनके उद्धार का उपाय बताया। फिर तीनों ने बताए अनुसार ही व्यवहार किया, जिसके बाद उनका उद्धार हो गया तथा दुख दूर हो गया।